जेएनयू में आरएसएस कैसे आया और कौन लाया ?- जगदीश्वर चतुर्वेदी
जेएनयू के बारे में यह मिथ है कि यह वाम का गढ़ है। वहां वाम के अलावा और कोई विचारधारा नहीं थी । सच्चाई यह नहीं है। हाल के वर्षों में वाम पर हमला करने के लिए मोदी गैंग ने जेएनयू को मोहरे के रूप में इस्तेमाल किया और आम जनता में यह भ्रम खड़ा किया कि जेएनयू तो वाम का गढ़ है।
मैंने छात्र आंदोलन में काम करते हुए कैंपस के इतिहास को जाना ,समझा और उसके वैचारिक वैविध्य को भी जाना। कई मायनों में जेएनयू आरएसएस की उच्च शिक्षा में प्रमुख नर्सरी के रुप में काम करता रहा है।
मेरा निजी अनुभव रहा है कि लाइफ साइंस, एनवायरमेंटल साइंस, कम्प्यूटर साइंस, बायोटैक्नोलॅाजी के स्कूल में संघ की विचारधारा से प्रभावित प्रोफेसरों का शत-प्रतिशत बहुमत था।एक-दो प्रोफ़ेसर काँग्रेस से जुड़े थे। इन स्कूलों में सबसे अधिक करप्शन भी था।इनके करप्शन के विवरण और ब्यौरे तत्कालीन केन्द्रीय शिक्षा मंत्रालय की संसदीय समिति की रिपोर्ट में उपलब्ध हैं। इसके अलावा ‘संसदीय पब्लिक एकाउंट कमेटी’ की रिपोर्ट में उपलब्ध हैं। इन तमाम रिपोर्ट के अंशों को हमने एसएफआई की ओर से छात्रों के सामने उद्घाटित भी किया था।जो छात्र अध्ययन करना चाहें वे इन सरकारी दस्तावेजों के ज़रिए साइंस के विभिन्न स्कूलों में व्याप्त भ्रष्टाचार और रिसर्च के निम्न स्तर के तथ्यों को जान सकते हैं।
साइंस के इन स्कूलों में पढाने वाले प्रोफ़ेसर इस क़दर प्रतिक्रियावादी और लोकतंत्र विरोधी थे कि वे अपने यहां पढ़ने वाले किसी को विद्यार्थी को वाम संगठन से जुड़ने के कारण परेशान करते, उत्पीड़ित करते और वाम संगठनों से दूर रहने का आदेश देते थे। उन प्रोफेसरों के ज्ञान का इतना निम्न स्तर का था कि उसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते।एक ही उदाहरण देना समीचीन होगा।
‘संसदीय पब्लिक एकाउंट कमेटी’ ने अपनी ज़ांच में पाया कि सन् 1983 तक, विगत एक दशक में, किसी भी प्रोफ़ेसर या छात्र का विश्व विख्यात साइंस की शोध पत्रिका में कोई शोध पत्र प्रकाशित नहीं हुआ था। जबकि करोड़ों रूपए के यूजीसी प्रोजेक्ट साइंस स्कूल के इन संघी प्रोफेसरों के पास थे। इस एकमात्र सूचना से आप आरएसएस के साथ जुड़े प्रोफेसरों की ज्ञान क्षमता का अंदाजा लगा सकते हैं।
विभिन्न साइंस स्कूल में आरएसएस का वर्चस्व था और ये सब काँग्रेस की छत्रच्छाया में नौकरी पर लगाए गए थे।साइंस स्कूल में गिनती के कुछ प्रोफ़ेसर काँग्रेस के साथ थे, जिनमें पी.एन. श्रीवास्तव का नाम प्रमुख है, वह जेएनयू के कुलपति बने और राजीव गांधी युग में शिक्षा नीति बनाने वाले पैनल के संयोजक थे। मैं उन दिनों छात्रसंघ का अध्यक्ष था।यह संक्षिप्त तस्वीर प्रोफ़ेसर जगत की इसलिए पेश की है जिससे वाम का जेएनयू , इस मिथ की हकीकत को आप सहज ही जान सकते हैं। उन दिनों कुछ प्रोफ़ेसर तो संघ की शाखा तक में जाते थे।
भारत का एक डबल जासूस था, नाम था -रामस्वरूप। वह भारत के साथ चीन -अमेरिका आदि के लिए भी जासूसी करता था। वह व्यक्ति सीबीआई के छापे के ज़रिए पकड़ा गया तो उसके घर से एक ट्रक भरकर सरकारी गुप्त दस्तावेज़ मिले। इनमें कुछ दस्तावेज वह भी थे जो इस बात को बताते थे कि कई प्रोफ़ेसर सीआईए के लिए काम करते हैं। इनमें तीन के नाम ख़ासतौर पर सीआईए के सीक्रेट दस्तावेजों में दर्ज पाए गए। इनको सालाना कई हजार डॅालर की मदद सीआईए संचालित संगठनों से मिलती थी। संयोग से इन तीनों का भगवा राजनीति से संबंध था।इनमें से एक प्रोफ़ेसर तो भाजपा के राष्ट्रीय कार्यकारिणी में थे और राज्यसभा के लिए भाजपा ने उनको नामांकित किया था। ये साहब एसआईएस में प्रोफ़ेसर थे ।ये साहब फ़िलहाल जिंदा नहीं हैं। कहने का आशय यह कि जेएनयू आरंभ से संघ की गतिविधियों के केन्द्र में था। अगली कड़ी में हम उन पहलुओं की जानकारी हासिल करेंगे कि किस तरह आरएसएस के लोग छात्रों में काम करते थे।
– जगदीश्वर चतुर्वेदी जी की कलम से
(चित्र प्रो.पीएन श्रीवास्तव – जेएनयू के पूर्व उपकुलपति)