क्या अखिलेश यादव जी का पीडिए प्यार सच्चा है? – निखिल सबलानिया

क्या अखिलेश यादव जी का पीडिए प्यार सच्चा है? – निखिल सबलानिया

अखिलेश यादव जी ही वही व्यक्ति हैं जिन्होंने 2012 के चुनावों से पहले सबसे अधिक बहुजन महापुरुषों की मूर्तियों और स्मारकों पर सबसे अधिक प्रहार किया। मुस्लिम तुष्टीकरण में वे हिंदुओं को भी भूल गए। पर मुजफ्फरनगर दंगों में वे मुसलमानों को भी भूल गए। आज़म खान जी और उनके पुत्र जेल में और अखिलेश जी ने सड़कों पर कोई आंदोलन नहीं किया। जबकि, मायावती जी के और बहुजन क्रांतिकारियों के स्मारकों के खिलाफ वे सड़कों पर उतरे थे। फिर सत्ता के जाने के डर से त्रैवर्णों के वोटों के लिए सबसे पहले प्रोमोशन में आरक्षण को रोका, जबकि आज जिस पीडिए की वकालत कर रहे हैं, उन बिचारे, और खासकर यादव समुदाय और अन्य ओबीसी के प्रमोशन भी सबसे पहले अखिलेश यादव जी ने ही रोके। इनका समाजवाद भी पहले स्वयं की जाति, फिर स्वयं का परिवार, और अंततः स्वयं को ही पार्टी का मालिक घोषित करने में पीछे छूट गया। फिलहाल न कोई विचारधारा है और न कोई संयम है। हाँ, मैं यह स्वीकारता हूँ, कि वे कई मुद्दों पर अपनी अलग, बेबाक और रिस्क लेकर राय रखते हैं, जैसा कि उन्होंने नोटबंदी में कहा था कि जिसे काला धन बोल रहे हैं, उससे भारत के आम लोगों की अर्थव्यवस्था चलती है, क्योंकि हर कोई बैंक के चक्कर नहीं काट सकता। चूंकि, उनका राजनीति में असल में कोई सामाजिक आदर्श नहीं है, और वे मौका देख कर बदल जाते हैं, इसलिए उनका पीडिए, या कांशीराम जी की जयंती मनाना, एक वोट बैंक प्राप्त करने का छलावा ही है। अखिलेश यादव जी का कांशीराम जी और बहुजन प्रेम के झूठ की सच्चाई इसी सबूत से साफ हो जाती है, कि उन्होंने मुख्यमंत्री पद पर रहते हुए मायावती जी द्वारा बनाए प्रेरणा स्थलों की न सिर्फ अनदेखी ही की, बल्कि, जानबूझकर कर उन्हें धराशायी करने के लिए छोड़ दिया। इसलिए, उन्हें पहले कम-से-कम दस साल सत्ता से बाहर रह कर पीडिए के लिए संघर्ष करना होगा, तब कहीं उन पर भरोसा कर सकते हैं। फिलहाल उनके हाथों में सत्ता देना पीडीए के भविष्य को ही ताक में रखने जैसा है। – निखिल सबलानिया

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