डॉ. सुनीता सावरकर के शोध ग्रंथ ‘चमार महिलाओं के संघर्ष का अनकहा इतिहास आंबेडकरवादी आंदोलन के परिप्रेक्ष्य में’ ने दलित इतिहास तथा स्त्री विमर्श के परिघ को और विस्तारित किया है।
इस शोध ग्रंथ की विशेषता है कि आंबेडकरी आंदोलन में उपेक्षित और विस्मृत चमार महिलाओं के अनकहे संघर्ष को इस में चिहित किया गया है। इसमें बाबासाहेब के आंदोलन में शामिल गुणाबाई गाडेकर और सावित्रीबाई बोराडे के योगदान के साथ-साथ बाबासाहेब के आंदोलन में चमार समुदाय के प्रमुख कार्यकर्ता, पा. ना. राजभोज और सीताराम शिवतरकर के घर की महिलाओ के बारे में बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है। डॉ. सुनीता ने तत्कालीन पत्र-पत्रिकाओं की खोज करके प्राथमिक स्रोतों के माध्यम से परिवारजनों की खोज की, उनसे संपर्क साधकर उनके द्वारा संग्रहित पत्र-पत्रिकायें, दुर्लभ महत्त्वपूर्ण दस्तावेज, दुधले हो चुके फोटो, दलित महिलाओं के हस्तलिखित घोषणापत्र, परिवार के इंटरव्यू इत्यादि आवश्यक ऐतिहासिक दस्तावेजों के गहन अध्ययन से शोध कार्य को पूर्णता प्रदान की। प्रस्तुत शोध ग्रंथ ने स्पष्ट रूप से यह तथ्य सामने रखा है कि अआंबेडकरी आंदोलन में चमार महिलाओं का बराबर का योगदान रहा है, अपितु सामाजिक सांस्कृतिक परिवर्तन में महिलाओं की भागीदारी को पहली बार रेखांकित किया गया है। इतिहास विषय में शोध कार्य के लिए यह शोध ग्रंथ दिशा निर्देशक साबित होगा यह मेरा मानना है। डॉ. सुनीता सावरकर सफलता की सीढ़िया चढ़ते हुए आकाश छू लें, यही शुभकामनाएं।
– डॉ. विमल थोरात
प्रोफेसर (निवृत्त) मानविकी विद्यापीठ
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय दूरशिक्षा विश्वविद्यालय, नई दिल्ली
वरिष्ठ दलित लेखिका



