शूद्र कौन थे? उनका मूल क्या था? वे समाज में चतुर्थ वर्ण के रूप में कैसे स्थापित हुए? और प्राचीन भारत की सामाजिक संरचना में उनके स्थान का वास्तविक इतिहास क्या है?
इन प्रश्नों की ऐतिहासिक पड़ताल करने वाली डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर जी की यह महत्वपूर्ण कृति भारतीय सामाजिक इतिहास के अध्ययन की एक उल्लेखनीय पुस्तक है। ऋग्वेद और महाभारत जैसे प्राचीन ग्रंथों के विस्तृत अध्ययन के आधार पर डॉ. आंबेडकर जी शूद्रों के अतीत और उनके सामाजिक रूपांतरण की खोज करते हैं।
यह केवल शूद्रों के इतिहास की खोज नहीं, बल्कि प्राचीन भारत के समाज, उसकी संरचना, परिवर्तन और सामाजिक विभाजनों को समझने का एक गंभीर प्रयास है। प्राचीन आख्यानों, वैदिक संदर्भों और ऐतिहासिक प्रमाणों को सामने रखते हुए डॉ. आंबेडकर जी उन धारणाओं पर प्रश्न उठाते हैं, जिन्हें लंबे समय से समाज में स्वीकार किया जाता रहा है।
इस पुस्तक का प्रस्तुत हिंदी संस्करण निखिल सबलानिया के दस वर्षों के परिश्रम का परिणाम है। उन्होंने पूर्ववर्ती हिंदी अनुवादों का मूल अंग्रेज़ी पाठ से मिलान करते हुए इस कृति को अधिक शुद्ध, सहज, प्रवाहपूर्ण और सरल हिंदी में प्रस्तुत किया है, ताकि डॉ. आंबेडकर जी के गहन अध्ययन तक सामान्य पाठक की भी सहज पहुँच हो सके।
प्राचीन भारतीय समाज के इतिहास, वर्ण-व्यवस्था के विकास और शूद्रों की सामाजिक स्थिति को समझने की इच्छा रखने वाले पाठकों के लिए यह पुस्तक एक गंभीर और विचारोत्तेजक पाठ है।
यह पुस्तक अतीत को केवल पढ़ने के लिए नहीं, उसे नए प्रश्नों के साथ देखने के लिए आमंत्रित करती है।



