आरक्षण विरोध की आग लगाकर बीजेपी सिर्फ और सिर्फ उत्तर प्रदेश के चुनाव में अपने वोट को बचाए रखना चाहती है, जो कि उनके हाथ से निकल चुका है।
क्या आरक्षण विरोधी संगठनों को यह नहीं पता, कि बीजेपी के राज में कितना अधिक निजीकरण हुआ है, कितनी कम सरकारी नौकरियां दी गई हैं, कितने शिक्षा संस्थानों पर ताले लगे हैं, कितने बेरोजगारों और व्यापारियों ने देश सदा के लिए छोड़ दिया है, और देश की संपत्ति पूंजीपतियों के हाथों में जा रही है?
व्यापारी क्यों देश छोड़ रहे हैं, जबकि, व्यापार में तो कोई आरक्षण लागू नहीं होता? सेना में तो आरक्षण नहीं था, फिर सेना में अग्नि वीर योजना क्यों लेकर आए? इस योजना का असर उन लोगों पर पड़ा जो आरक्षण से आते थे, या उन पर पड़ा जिनका आरक्षण नहीं था?
मौजूदा सरकारी खाली स्थानों को अब तक भारा क्यों नहीं गया? 150 करोड़ की जनसंख्या में उच्चतम न्यायालय के जजों के ही खाली स्थानों को अब तक नहीं भरा गया। अभी दिल्ली में दो खबरें आई, कि राजधानी का मलेरिया डिपार्टमेंट ही नहीं है। इन विभागों में पूरे के पूरे 14 पद अधिकारियों के ही खाली पड़े हैं। पिछले साल यह खबर आई थी, कि दिल्ली में वन विभाग के उच्च पद खाली पड़े हैं जिससे दिल्ली में पेड़ों की कटाई नहीं हो पा रही थी। दिल्ली विश्वविद्यालय से लेकर देश के लगभग सभी सरकारी शिक्षा संस्थानों में कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियां क्यों दी जा रही है? सरकार द्वारा नौकरियों के न दिए जाने और कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियां दिए जाने का परिणाम यह है, कि निजी क्षेत्र में भी सैलरियां घट गई हैं।
ऐसे सैकड़ो सरकारी डिपार्टमेंट हैं जिनमें पद खाली पड़े हैं, पर उन पदों को भरने के लिए कोई आंदोलन क्यों नहीं होता? खुद बीजेपी के गवर्नर रहे एन. एन. वोहरा जी ने अपनी पुस्तक में, देश की सुरक्षा पर मंडराते खतरों के कारणों के उपायों के रूप में यह बताया है, कि पुलिस विभाग में सुरक्षा कर्मियों की तादाद बहुत कम है। तो पुलिस कर्मियों की अतिरिक्त भर्ती क्यों नहीं की जा रही? क्या देश की सुरक्षा आपका मुद्दा नहीं है? इस पर आंदोलन क्यों नहीं करते?
अभी पीछे एक और खबर आई थी, कि भारत में स्वास्थ्य विभाग में दाइयों की मात्रा बहुत कम है। तो उस मात्र को बढ़ाया क्यों नहीं आ रहा? आंगनवाड़ी की आशा वर्कर्स पर ही सारा बोझ डाल दिया जाता है, पर उनकी सैलरी क्यों नहीं बढ़ाई जा रही? चुनावों और जनगणना के समय शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ डाल दिया जाता है, तो आप सरकार से यह क्यों नहीं कहते कि अपने ऐनसिलरी (सहायक) यानी कि, अतिरिक्त कामों के लिए एक अलग स्टाफ की परमानेन्ट नियुक्ति करें।
आप किसी भी विभाग में चले जाओ तो हर विभाग के लोग यही कहेंगे कि स्टाफ कम है। तो आप सरकार से यह क्यों नहीं कहते कि स्टाफ क्यों नहीं बढ़ाते? वर्ष 2025 में केंद्र सरकार ने 2 लाख करोड़ रुपए से कम खर्च अपने स्टाफ की सैलरी पर किया है, जबकि, वर्ष 2024 में ही लगभग 4.32 लाख करोड़ रुपए एनपीए में चले गया, यानी कि, उन व्यापारों में चले गए जिनसे कि वापसी नहीं हो पाई, यह 2024 में 4.81 लाख करोड़ और 2023 में तो 5.71 लाख करोड़ रूपया था। यह भारत के नागरिकों का वह धन था, जिससे उन्हें नौकरियां दी जा सकती थी और कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियां पक्की की जा सकती थी, पर उन्हें नहीं दी गई। सरकार से पूछो कि यह धन आरक्षित वर्गो को दिया गया या अनआरक्षित वर्गों को?
लगभग पौने दो लाख करोड़ रूपया 2025 में व्यापारियों को बैंकों के द्वारा माफ किया गया। पिछले वर्ष बीजेपी ने अपने इंफ्रास्ट्रक्चर बजट को बढ़ाकर 20 लाख करोड़ कर दिया। इससे कोई सरकारी नौकरियां नहीं बढ़ेंगी, बल्कि, बड़े और छोटे ठेकेदारों को सीधा जनता का धन पहुंचेगा और जिसमें से नेताओं की दो नंबर की कमाई होगी। जरा कोई बताएगा कि इन बड़े और छोटे ठेकेदारों में क्या आरक्षण का कोई आंकड़ा किसी के पास है? पर यह सवाल कोई नहीं पूछता, कि जब इस प्रकार से भारतीयों का धन खर्च और व्यर्थ हो रहा हैं, तो नौकरियां देने, बढ़ाने और पक्की करने में इनको क्या एतराज है? ठीकरा है तो सिर्फ आरक्षण पर ही फोड़ना है।
कॉन्ट्रैक्टचुअल बेस्ड नौकरियां तो बीजेपी के हाथ में थी, पर उन्होंने संविदा, यानी कि, कॉन्ट्रैक्ट आधारित नौकरियों को खत्म करने की जगह और बढ़ा दी। जब नौकरियां अस्थाई कॉन्ट्रैक्ट के ऊपर चली जाती हैं, तो इसमें न तो आरक्षित और न अनारक्षित के रोजगार की सुरक्षा रह पाती है। बहुत से सरकारी खाली पदों को सिर्फ डेपुटेशन पर ही क्यों भरा जाता है, जबकि देश में इतने काबिल लोग बेरोजगार हैं? जो अधिकारी रिटायर हो जाते हैं उनको वापस क्यों नौकरियों पर रखा जाता है? रिटायर्ड अधिकारियों और जजों के पैनल क्यों बनाए जाते हैं जिनको पहले से पेंशन मिल रही है, जबकि और भी अन्य काबिल लोग मौजूद हैं, जिन्हें नौकरियां नहीं मिली?
यह कहकर सरकारी नौकरियों के पदों को खाली क्यों छोड़ दिया जाता है, कि योग्य उम्मीदवार नहीं मिला? क्या इनको 150 करोड़ में भी योग्य उम्मीदवार नहीं मिलता? जबकि, निजी क्षेत्र में तो न कोई प्रवेश परीक्षा होती है और न कभी कोई स्थान खाली रहता है। निजी क्षेत्र वालों को कैसे बिना किसी प्रवेश परीक्षा के योग्य उम्मीदवार मिल जाता है? जबकि, खेलों में देखो तो डेढ़ लाख की आबादी वाला देश भी योग्य फुटबॉल के खिलाड़ी पैदा कर लेता हैं और यहाँ 150 करोड़ वाले 15 खिलाड़ी भी पैदा नहीं कर पाते। भारतीय फुटबाल संघ में 25 लख रुपए ज्योतिषियों को सिर्फ यह बताने के लिए दिए कि कौन सा खिलाड़ी अच्छा खेलेगा। क्या यह 25 लख रुपए और किसी अच्छे कम पर नौकरियां पक्की करने के लिए नहीं दिए जा सकते थे? क्या ज्योतिष के बताने पर अच्छा खेलते हैं खिलाड़ी? इस पर कोई आंदोलन क्यों नहीं करता?
हजारों करोड रुपए के, भारतीयों के धन को सरकार अपने विज्ञापनों पर क्यों हर वर्ष खर्च करती है? क्या इस धन को कहीं और लगाकर सरकार पक्की नौकरियां नहीं दे सकती? और यदि ऐसे अखबारों, सोशल मीडिया कंपनियों और टीवी चैनलों में, जहां पर सरकार अत्याधिक धन विज्ञापनों के लिए देती है, तो वहां की नौकरियों को सरकारी नौकरियों में क्यों नहीं तब्दील किया जाता, जबकि धन नागरिकों का ही वहां जा रहा है?
सरकारी कामों को ठेकों के द्वारा किया जाता है, पर ठेकों में तो आरक्षण नहीं है। पर सवाल यह है, कि आप बीजेपी से यह क्यों नहीं पूछते, कि ठेकों पर काम क्यों दिया जाता है? यदि इस काम के लिए परमानेंट स्टाफ रखा जाए तो नौकरियां सबके लिए बढ़ेंगी। पर क्योंकि ठेकों से दो नंबर की कमाई होती है, इसलिए वह काम खुद सरकार नहीं करती, जबकि सरकार के पास हर प्रकार के साधन हैं। जब मजबूत और लाखों करोड़ रुपए के बजट वाली सरकार ही जो काम नहीं कर सकती, तो कोई निजी कंपनी में ऐसे क्या सुर्खाब के पर लग जाते हैं, कि वे वही काम कर लेते हैं? यह पूछने के लिए कोई आंदोलन क्यों नहीं होता?
आरक्षण का विरोध सिर्फ चंद संगठनों के द्वारा किया जा रहा है, जिनको बीजेपी से फायदा उठाना है, ठीक उन्हीं पूंजीपतियों की तरह जिन्होंने देश को अपने लालच की हवस की चारागाह बनाया हुआ है। देश में राजनीतिक हवा बदल रही है और बीजेपी को यह पता लग चुका है। इसलिए विपरीत हवा को अपनी तरफ मोड़ने के लिए ही आरक्षण विरोध की आग भी लगा रहे हैं और उस पर पानी भी डाल रहे हैं, ताकि बड़ा वोट बैंक जो एससी एसटी ओबीसी का है, वह भी उनसे छिटक न जाए। आखिरकार, राजनीति षड्यंत्र से चलती है। महाभारत तो इसका प्राचीन उदाहरण है, कि कैसे पांडवों के खिलाफ कौरवों ने एक के बाद एक कई षडयंत्र रचे। ऐसे ही बीजेपी आज भारत, भारत के लोगों और लोकतंत्र के खिलाफ साजिशें नहीं है।
लेखक – निखिल सबलानिया Nikhil Sablania
23 अगस्त 2026
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