सबसे बड़ा सवाल ये है कि बीजेपी ने अरविंद केजरीवाल जी के केस में, पहले चुनाव आयोग से शिकायत करके फिर जांच एजंसियों को निर्देश क्यों नहीं दिलवाए? क्योंकि इनको छोड़ने में यह एक प्रमुख कारण जज ने बताया है। क्या बीजेपी जैसी पार्टी को नियमावली पता नहीं होगी? असल में बीजेपी ने जानबूझकर ऐसा किया ताकी इन्हें छोड़ा जाए। हां, थोड़ा दबा कर रखने के लिए परेशान किया है। पर पंजाब चुनावों से पहले, एक स्वतंत्रता सेनानी जैसी छवि बना कर छोड़ इन्हें दिया है। इनसे सबसे ज्यादा नुकसान बहुजन समाज पार्टी (बी एस पी) को करवाना है, जो भारत के सबसे कमजोर तबके का प्रतिनिधित्व करती है। दिल्ली में इनके आने से पहले दिल्ली में बीएसपी का वोट प्रतिशत 13% था और 16 काउंसलर थे, पर वोट प्रतिशत इनके आने से आगे बढ़ने की जगह नग्न हो गया। पंजाब में भी बीएसपी अच्छी वोट संख्या में थी, पर वहां भी उनके समर्थकों की संख्या को अपने पाले में करके इन्होंने सरकार बना ली। यह मनुवादी साजिशें हैं कि कैसे भारत के लोगों को काबू में रखा जाए। इनके पीछे खुद त्रैवर्णिक मानसिक गठबंधन होता है, जिसमें भी वर्ण व्यवस्था का परस्पर संघर्ष चलता है और ब्राह्मण वर्ण के कूटनीतिज्ञ खूद को इस सारी व्यवस्था के नियंतत्रक और बाकी वर्णों के नेताओं की सीमा निर्धारित करने वाले पहरेदार होते हैं, कि वे ऐसी सीमा न उंघाले कि वर्ण व्यवस्था टूट जाए। आर. एस. एस. के कूटनीति के ब्राह्मण ये काम करते हैं। और इसलिए, केजरीवाल जी को संदेश दिया गया है, कि क्योंकि वो वर्ण व्यवस्था में तीसरे पायदान पर, वैश्य वर्ण, से हैं, इसलिए वर्ण व्यवस्था में अपना स्थान न भूलें, पर रहेंगे त्रैवर्णिक गठजोड़ का हिस्सा। ऐसा गठबंधन न सोच कर या आपसी विमर्श के बिना भी हो जाता है, क्योंकि, जैसा कि कानून कहता है कि, ये समान स्वार्थो के लिए, समान विचारधाराएं होती है, मीटिंग ऑफ माइंड्स। पर असल में ये शोषण तत्व होते हैं, जो अंततः सभी का शोषण करते हैं, अपने वर्ण वालों का भी, क्योंकि इनके स्वार्थ ही इनके अंतिम उद्देश्य होते हैं। केजरीवाल जी एक निहायती चालाक आदमी हैं। मैं इन्हें एक अपराधी ही मानता हूँ और इनका सबसे बुरा अपराध यह है कि इन्होंने दिल्ली के गरीब लोगों के बोलने का तरीका सीखा और वैसे ही तरीके से बोल कर लोगों को अपनेपन का ऐहसास कराया। पर असल में इन्होंने उनकी राजनीतिक शक्ति, बीएसपी, को कमजोर किया, उन्हें इस बात का ऐहसास दिलाए बिना। साथ ही, इन्होंने भारतीय लोकतंत्र को अपूर्व क्षति पहुंचाई है, क्योंकि इन्होंने राज्य और उसके नागरिकों के संबंध को राजनैतिक मुद्दों के संवाद से बदल कर, पूंजीवादी व्यवस्था के लेन-देन वाले संबंध में बदल दिया, जिससे लोगों ने देश और राज्य के बारे में न सोच कर अपने बारे में ही संकुचित होकर सोचना शुरू कर दिया। इससे नागरिकों का देश से विच्छेद होता है जो आगे अलगाव भी बन सकता है। केजरीवाल जी धर्मनिरपेक्ष का भेस धर कर आए पर हिंदू धर्म का प्रचार करते रहे, और जब अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, पर प्रहार होते, तो ये और इनकी पार्टी चुप हो जाती। झाड़ू का चुनाव चिन्ह लेकर, सबसे पहले तो इन्होंने वाल्मीकि समुदाय के लोगों को बेवकूफ बनाया और उन्हें लगा कि ये उनके लोगों या उनके हितों की पार्टी है। इनके उपनाम से दिल्ली के अनुसुचित जाति को लगा कि ये कोई त्रैवर्णिय नहीं है। मीडिया और चुनावों में अथाह धन फूंका गया, जिसकी जांच आजतक बीजेपी ने क्यों नहीं की है? अरविंद केजरीवाल जी किसी लोमड़ी की तरह तेज हैं और उसी प्रकार के ठगों की श्रेणी के हैं जैसे ब्रिटिश काल में भारत में कुख्यात ठग हुआ करते थे। इनके हर कदम और हर बात को जांचना चाहिए। हाल ही में इनकी पार्टी के राघव चड्ढा ने चुने हुए प्रतिनिधियों को हटाने की बात की। यह रेफरेंडम का वही तरीका है जिससे बंगलादेश की चुनी हुई सरकारें कमजोर होती हैं और बार-बार गिरती है, इससे अराजकता फैलती है और लोकतंत्र को बड़ी क्षति पहुंचती है। जब हमारे संविधान निर्माताओं ने एक बात समझा दी थी कि पांच सालों का समय है अपनी सरकार का काम देखने के लिए और पांच साल बाद सरकार बदलने के लिए, तो हमें उन पर विश्वास रखना चाहिए और इससे चुनावों का अतिरिक्त बोझ भी नागरिकों पर पड़ता है। साथ ही, यदि शासन क्रूर हो जाए तो अविश्वास प्रस्ताव का तो पहले से संविधान में प्रावधान है ही। पर ये स्थाई सरकार को बार-बार ऐसे गिराना चाहते हैं जैसे किसी कंपनी के भाव सट्टा बाजार में गिरते हैं। साथ ही ये इंटर्नेट पर राॅबोटस की मदद से बहुत ज्यादा प्रचार करके अपनी बात लोगों के दिमाग में जबरदस्ती ठूंसते हैं। ऐसा करके ये कृत्रिम तरीके से राय बनवाते (ओपिनियन फॉर्म) करते हैं, जो लोकतंत्र के लिए बहुत बड़ा खतरा है। इनके बारे में यह भी भ्रम है कि ये कोई मध्यम वर्ग से हैं। जबकि, अरविंद केजरीवाल जी हरियाणा से एक संपन्न परिवार से हैं, इनके दादाजी ने हरियाणा के पूर्व मुख्यमंत्री देवीलाल जी के विरूद्ध चुनाव लड़ा हुआ है, केजरीवाल जी कान्वेंट स्कूल के पढ़े हैं, और उस समय आई. आई. टी. पढ़ने गए जब उसके बारे में एक प्रतिशत भारतीयों को भी पता नहीं होगा और वहां जाने के महंगी कोचिंग या मोटी रिश्वत की जरूरत होती थी। इन्होंने मुख्यमंत्री बनने के बाद अपनी जाति के बड़े व्यापारियों को कारोबार में कई सहुलियतें दी हैं। यह उस जाति, वैश्य, से आते हैं जिसके पूंजीपति, अंबानी, अडानी, बिड़ला, आदि, भारत के सभी बड़े उद्योगों, राजनैतिक दलों, सनसाधनों, मीडिया और बाजार को नियंत्रित करते हैं। इनकी जाति के पूंजीपतियों ने जैन धर्म भी अपनाया हुआ है, इसलिये इन्हें जैनी पूंजीपतियों का सहयोग भी मिल जाता है। इनका पहला दफ्तर, लाखों रूपये महीने के किराये वाली जगह पर एक जैनी पूंजीपति ने मात्र एक रूपया मासिक किराये पर दिया था। इनकी पार्टी का बहुरूपियापन है कि पहली बार चुनाव लड़ने के लिए गरीब वर्ग के विधायक बनवाए और बाद में उनको एक तरफ कर दिया। अरविंद केजरीवाल जी पर इंकम टैक्स कमीशनर की नौकरी में रहते हुए कोई इंक्वायरी नहीं बैठी, इसका मतलब वे पाकसाफ नहीं है। अक्सर भ्रष्टाचारी अफसरों को इंक्वायरी से पहले ही सूचित कर दिया जाता है और या तो उनका रातोंरात तबादला कर दिया जाता है या वे खुद नौकरी त्याग देते या सेवानिवृत्त हो जाते हैं। हाँलाकि, मैं इस बात की पुष्टि नहीं करता, पर वित्तिय सेवाओं से जुड़े और बीजेपी के एक करीबी व्यक्ति ने मुझे यह बताया कि राघव चड्डा जब सी. ए. थे तो काले धन वालों की फाईलें पास करवाने केजरीवाल जी के पास ले जाते थे और तब ही से इनके घनिष्ट संबंध बनें। अरविंद केजरीवाल जी से वैसी ही सतर्कता रखनी चाहिए जैसी किसी भेड़िये के घर में घुस आने पर, शिशुओं से भरे घर की रखनी पड़ती है। अंततः मैं यही कहूंगा, कि यह लेख उनके लिए है जो भारत में एक सही लीडर चाहते हैं और राजनीति को समझना चाहते हैं। आप चाहें राजनीति में पड़ें या नहीं पड़ें, राजनीति आपका जन्म से लेकर मृत्यु तक पीछा नहीं छोड़ती। – निखिल सबलानिया Nikhil Sablania
डॉ. भीमराव आंबेडकर जी और निखिल सबलानिया जी की लिखित पुस्तकें और उनके जीवन और कार्यों पर 60 पुस्तकों का सैट यहां से ऑर्डर करें