नालायक बेटा होना मंजूर है! – शूद्र शिवशंकर सिंह यादव जी
नालायक बेटा होना मंजूर है!
पिता जी! आप का बार-बार मोबाइल पर यह कहना कि, बेटा! हम दोनो की उम्र ढल चुकी है, तुम्हारा छोटा भाई भी अपने कामों में इतना ब्यस्त रहता है कि, चाहकर भी, हमलोगों का ध्यान नही रख पाता है। तुम ही तो हम दोनों के आस और प्यास के पहले पुत्र हो, बुढ़ापे में तुम्हारी याद भी बहुत ज्यादा आती है। अब तुम यहीं आकर हमलोगों के साथ रहो।
पिता जी आप का कहना सही है, लेकिन आप नें हमें अच्छी पढ़ाई- लिखाई कराकर अमेरिका भेज दिया। यह आप के लिए बहुत बड़ी त्रासदी साबित हो रही है, लेकिन मेरे और मेरे परिवार के लिए आप ने भाग्यशाली वरदान दे दिया है। जिसकी पूर्ति मैं कभी भी नहीं कर सकता हूं। इसका मुझे दुःख है।
पिता जी मैं यहां खुली हवा में, स्वतंत्र वातावरण में, अपनी इच्छानुसार सांस ले रहा हूं। यहां पर हमारे पडो़सी, आफिस के साथी या अन्य कोई भी हमारी जाति नहीं पूछता है और यदि बतानी भी, कभी पडे़ तो, बड़े गर्व से बताते हैं और लोग आदर से सिर झुकाकर शुक्रिया व धन्यवाद देते है। ऐसा आनंद कभी जिंदगी में भारत में महसूस नहीं कर पाया। वहां पर यदि कर्मचारी बास या मालिक को सलूट नही किया तो, नौकरी तक जाने का खतरा बन जाता है, लेकिन पिता जी यहां काम करने वाले कर्मचारियों की इतनी इज्जत है कि, मालिक या बास ही पहले सर झुका देता है।
सार्वजनिक स्थल हो या चर्च, किसी भी सामाजिक या सांस्कृतिक कार्यक्रम मे शारीरिक भिन्नता होने के बावजूद भी, बिना किसी भेदभाव के, मान- मर्यादा के साथ सम्मिलित होने का मौका मिलता है। एक सुखद आनंद की अनुभूति होती है। आप के दोनो पोते बब्लू और डब्लू भी इसी माहौल में आनंद ले रहे हैं।
मै चाहता हूं कि आप और मम्मी भी यहीं आकर हमलोगों के साथ रहें, लेकिन आप की अपनी जिद्द, अपनी मातृभूमि बुढ़ापे में कैसे छोड़ दूं? अंतिम सांस लूगा तो काशी में।
पिता जी आप की जाति को उसी काशी के ब्राह्मणो ने ही शूद्र कहा, कहा तो कोई बात नहीं, लेकिन उसे नींच, दुष्ट, पापी कहकर, अछूत बनाकर कलंकित किया। अज्ञानता में भाग्य-भगवान की नीयत समझकर आप ने स्वीकार कर लिया।
मुझे आश्चर्य तब और लगता है, जब आप के पिता जी ने, जहां तक कि मुझे मालूम है, कोई जमीन, जायदाद या संपत्ति बपौती में आप को ट्रांसफर नहीं किया था, लेकिन जाति-पाति की सभी धार्मिक घिनौनी सामाजिक बुराई की संपत्ति आप ने बपौती के रूप मे ले लिया था। मांफी चाहता हूं! वही मैं न लेना चाहता हूं और न ही अपने बच्चो को बपौती मे ट्रांसफर करना चाहता हूं।
हां, एक बात और है, जब मैं आऊंगा तो, मैं किसी भी बाबू साहब को सलूट या सलाम तथा पंडित जी को “पांव लागी पंडित जी” नहीं करूंगा, जो मैं आप को करते हुए देखा है। मुझे अब यह एहसास हो गया है कि हम और आप भी इन परजीवी, ढोंगी, पाखंडी ब्राह्मणों से उच्च हैं। इसका एहसास ही नहीं, आप को शूद्र होने का गर्व भी महसूस करना होगा।
पिता जी आप को इसका आभास नहीं है, लेकिन ब्राह्मणों को हो गया है, जब उन्हे कोई आजकल पलग्गी नही करता है तो, अब पहले की तरह, उनकी कोई प्रतिक्रिया नही होती है। यदि आप को विश्वास नहीं है तो आप अंतिम और एक बार अपने पुरोहित पंडित के पास जाकर प्यार से कहिए कि, ए पंडित जी! मेरा बेटा अमेरिका में लंइन्जीनियर है और आप का बेटा यहा गांव मे गोबर फेंकता है तो, आप उच्च और मैं नींच कैसे हो गया?, इसका जबाब आप को आज देना ही होगा। नाराज तो बहुत होगा, आप को सावधानी बरतनी होगी, लेकिन बस इतना ही पूछना उसके घमंड को चूर कर देगा और आप को सुखद एहसास का अनुभव होगा।
आप के सुपुत्र और मेरे छोटे भाई सितेन्दर का भी फोन काल आया था। उसे भी समझाने की बहुत कोशिश की थी। लेकिन आप की बात न मानने पर, हमें वह भी कह रहा था कि, तुम जैसे पढे़- लिखे लोगों में संस्कार नहीं है, बाप की नालायक औलाद हो तुम। मैनें कहा, तुम कहते हो तो स्वीकार है, लेकिन एक शर्त पर, मैं आने को तैयार हूं। तुम्हें भी धार्मिक पूजा- पाठ के पाखंड को छोड़ना होगा। तुम्हें ऐसे सभी देवी-देवता और भगवानों को घर से बाहर फेकना होगा, जो हमारे दर्शन मात्र से अपवित्र हो जाते हैं। फिनाइल डालकर पूरे घर को भीम सोप से साफ करना होगा। इतना साफ हो कि वहां आने पर हमारे बच्चों को इस धार्मिक मानसिक कचरे का जरा भी आभास नहींं होना चाहिए। यह तुम्हारी जिम्मेदारी बनती है और यदि ऐसा नहीं हुआ तो, नालायक बेटा होना ही मुझे मंजूर होगा! नाराज होकर फोन काट दिया था।
पिता जी भाई को समझाइए कि, वह हमारे भी भावनाओं को समझने की कोशिश करें।
आप के फोन काल के द्वारा सुखद समाचार की आशा मे!
प्रणाम!
आप का बेटा परिन्दर!
गूगल@ शूद्र शिवशंकर सिंह यादव
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