बीजेपी नेता को जाति की सच्चाई पता होनी चाहिए, मेहनत नहीं बल्कि त्रैवर्णिक आरक्षण व एकाधिकार है हजारों सालों – निखिल सबलानिया से

बीजेपी नेता बृज भूषण सिंह ने आरक्षण पर एक बहुत ही विरोधाभासी बात कही है जिसका जातिवादी समर्थन कर रहे हैं। इनका कहना है कि तथाकथित त्रैवर्ण (बनियान, बामण, राजपूत) मेहनत करेगा पर आरक्षण नहीं लेगा। मैं कई वर्षों बाद राजस्थान गया। मैंने देखा कि कई अनुसूचित जाति के लोगों ने दुकानें खोल रखी हैं। मैंने एक व्यक्ति से इस बदलाव का कारण पूछा। उन्होंने जवाब दिया कि बनिया जाति के लोग दूसरे राज्यों में चले गए हैं, इसलिए अब लोग दुकानें खोल पा रहे हैं। पहले जाति व्यवस्था के एकाधिकार के कारण बनिया लोग दूसरों को दुकानें खोलने से रोकते थे और अनुमति नहीं देते थे। मुझे याद है कि 1997 तक दुकानें केवल बनियों के स्वामित्व में थीं। अब, बनिया जाति के लिए ऐसा आरक्षण दो हजार वर्षों से चला आ रहा था। राजपूतों की बात करें तो, उनके पास जमीन है और अनुसूचित जाति के लोग भूमि सीमा लागू होने तक बंधुआ मजदूर और भूमिहीन थे। हजारों वर्षों के बाद उन्हें जमीन मिली। क्या यह राजपूतों के लिए पूर्ण आरक्षण नहीं था कि उनके पास जमीन थी, वे कर वसूलते थे, हथियार रखने का अधिकार रखते थे, सेना बना सकते थे? शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार जगजाहिर है कि उन्होंने कठोर नियम बनाए और शूद्रों (अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति/अन्य पिछड़ा वर्ग) के लिए तो मृत्युदंड तक का प्रावधान था। अब, स्वतंत्रता के बाद, जिन लोगों ने सभी जमीनों और संसाधनों पर एकाधिकार कर रखा था, उन्होंने राजनीति और पूंजी पर भी एकाधिकार कर लिया है और उसे अपनी ही जाति के लोगों को दे दिया है। वे आरक्षण न लेने की बात कैसे कह सकते हैं, जबकि उन्हें हज़ारों वर्षों से जातिगत आरक्षण और एकाधिकार प्राप्त है? और मुझे आश्चर्य होता है कि लोग इस शर्मनाक व्यक्ति का समर्थन कैसे कर रहे हैं जिसने भारतीय महिला पहलवानों का शोषण, दुर्व्यवहार और अपमान किया। एक सभ्य समाज में ऐसा व्यक्ति राष्ट्रविरोधी है, लेकिन जातिवादी मानसिकता के कारण लोग उसका समर्थन कर रहे हैं। – निखिल सबलानिया

 

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