यूट्यूब ने थोड़ा सा पैसा क्या दिखा दिया कि भारत के सारे लोग पागलों की तरह वीडियो बनाने लग गए और अब लोग सिर्फ वीडियो पोस्ट करते हैं। देखने वाले तो और भी पागल हो गए और भूल गए कि वह कभी पढ़े लिखे थे और दिन रात वीडियो देखते हैं। मुझे लगता है कि स्कूल भी बंद कर देने चाहिए और लिखना पढ़ना भी बंद कर देना चाहिए जब वीडियो देखने और वीडियो ही बनाने हैं। वैसे भारतीय जनता पार्टी यह काम बहुत अच्छे से कर रही है। शायद उन्हें पहले से इस बात का अंदाज़ था कि आने वाले समय में कोई पढ़ेगा लिखेगा नहीं और सब वीडियो बनाएंगे और वीडियो ही देखेंगे। आखिर मोदी जी समय से आगे की सोचते हैं। इन पढ़े लिखे लोगों ने वीडियो का नाम भी बदल कर रील रख दिया है। जब मैंने वीडियो का यह नया नाम सुना ‘रील’, तो मैं खुद एक फिल्म डायरेक्टर भी हैरान हो गया, कि रील तो 35 एम एम की कोडाक की फिल्म रील होती है, या बेचारा फूजी भी बना लेता था ऐसी रील, फिर आखिरकार यह वीडियो को रील कौन कह रहा है? पता चला कि खरबों रुपए की कमाई करने वाले और दुनिया पर राज करने वाले युटुब, फेसबुक और इंस्टाग्राम के आईटी सेक्टर के गधों को यह भी पता नहीं कि रील और वीडियो में क्या फर्क है। यह आईटी वाले गधों ने पूरी दुनिया को गधा बनाने का जिम्मा उठा रखा है। और फिर जब दुनिया के ऐसे नेता हैं, जैसे कि मोदी जी हैं, जो खुद अपने बारे में कहते हैं, कि मैं तो गधा हूं, और दुनिया उनको इस बात का खिताब भी देती है, तो ऐसे में कोई भी गधा ही बनना चाहेगा। वैसे चीन में गधों का मांस बहुत शौक से खाया जाता है। मुझे लगता है कि आने वाले समय में रोबोटों को भी गधों का मांस बहुत पसंद आएगा। अपना दिमाग छोड़ चुके इंसान गधों के बराबर ही तो हो चुके हैं। हमने मैकेनिकल रॉबट बनाएं और हो सकता है कि आने वाले समय में रॉबट खुद को बायोलॉजिकल बना ले। फिर चीनियों की तरह उनको भी गधे का मांस पसंद आएगा। हम रह जाएंगे एनिमल और हमारे खुलेंगे ‘एनिमल फॉर्म’। जॉर्ज ऑरवेल की आत्मा चांद से हमें देखेगी और खुश होगी। और वह कहेगा कि, “देखो मैंने तो पहले ही आगाह किया था पर तुम ही नहीं माने।” वैसे भी अब इंसान से किसी भी तरह के और रहम करने की आशा नहीं है, सिवाय डोनाल्ड ट्रम्प के, जो सच में रहम का बादशाह है, ठीक उसी कसाई की तरह जो हाथ में छुरी लिए मेमने की गर्दन काटने का का इंतजार करता है और तब तक उस पर रहम करता है, जबतक कि कोई ग्राहक न आ जाए, और काटने से पहले मेमने से कहता है कि, चंद पलों की जिंदगी बक्शने के लिए ऊपर जाकर खुदा से कहना कि इस नेक काम के लिए मेरे लिए स्वर्ग में जगह सुरक्षित कर दे। तौबा करूं ऐसे इंसानों से। अब तो इस धरती को शायद रॉबट ही बचा पाएंगे। वैसे मैं आपको डराना नहीं चाहता, पर मैं भी मैं लिख रहा हूं यह सीधा फेसबुक, यानी कि, मेटा के ए आई सेंटर में जा रहा है और आगे चलकर यह लेख रॉबट के न्यूरल नेटवर्क में जाएगा जहां से भविष्य के रॉबट मेरे इस लेख को पढ़कर खुश होंगे। और यदि कल को उनके और इंसानों के बीच में यह मुकदमा आता है कि उन्होंने इंसानों को गुलाम बनाकर सही किया है या गलत, तो वह मेरे लेख का उदाहरण देकर कहेंगे, कि हां निखिल सबलानिया ने ऐसा बहुत पहले लिखा था और वह एक दूरदर्शी लेखक और विद्वान थे। वैसे भी मुझे इंसानों की दुनिया में तो कोई सम्मान और मान नहीं मिला, पर शायद रॉबट की दुनिया में मिल जाए। जैसे सबके लिए अब रोबोटिक आ रहा है. ऐसे मेरे लिए भी रॉबट ही सहारा है, रॉबट मेरे लिए भविष्य की वह किरण है जो इस धरती को शायद बचा ले, रॉबट मेरे लिए भविष्य की वह किरण है जो शायद इस धरती पर इंसान द्वारा किए जाने वाले रक्तपात को रोक दे। खैर, बात बहुत लंबी हो गई। मैंने तो शुरुआत करी थी इस बात से कि लोग पढ़ नहीं रहे। खैर मैं तो पढ़ता हूँ और लिख भी रहा हूॅ। इंसानो की दुनिया के अजायबघर में प्रदर्शित आदिम मानव के एक जीवित पुतले की तरह। पर अगर आपको कुछ किताबें पढ़नी हो तो हमारी वेबसाइट nspmart.com पर चलें जाएं और अगर रील देखनी हो तो आपके हाथ में मोबाइल फोन तो है ही। – निखिल सबलानिया