उपनिवेशी साम्राज्यवाद की वापसी – निखिल सबलानिया

साम्यवादी सोवियत संघ की लाल सेना ने हिटलर का खात्मा कर दिया और द्वितीय विश्व युद्ध समाप्ति पर था। इससे दुनिया को अपने नीचे रखने वाले पूंजीपति उपनिवेशी, साम्यवाद की ताकत से घबरा गए कि यदि दुनिया का यह नजरिया बन गया कि द्वितीय विश्व युद्ध को साम्यवादियों ने समाप्त किया है तो वर्ल्ड ऑर्डर (विश्व व्यवस्था) बदल जाएगी और उनके हाथों से निकल कर साम्यवादियों के हाथों में चली जाएगी। इसी घबराहट के कारण पूंजीपति उपनिवेशी देशों के सरगना अमेरिका ने जापान पर पहला परमाणु बम छोड़ा, जिससे डेढ़ लाख से ज्यादा लोग मरे। हालांकि, जर्मनी के हारे जाने के बाद युद्ध लगभग खत्म ही हो चुका था। साथ ही अमेरिका ने अपने परमाणु बम्ब का यह बहाना दिया था कि वह इसलिए उसे बना रहा है, क्योंकि जर्मनी भी उसे बना रहा है, इसलिए वह जर्मनी से पहले उसे बनाना चाहते हैं जिससे कि जर्मनी को रोक सके। पर सत्य तो यह है कि न जर्मनी परमाणु बम्ब बना पाया था और न उसकी हार के बाद परमाणु बम्ब की जरूरत थी। और कई वैज्ञानिकों, जैसे कि एल्बर्ट आइंस्टीन ने भी इसी कारण अमेरिका का साथ दिया था कि वे मानवता को बचाने के लिए बम्ब का निर्माण कर रहे हैं। पर हिरोशिमा के नरसंहार से ही इन रक्त पिशाचों का दिल नहीं भरा और तीन दिन बाद एक और बम्ब छोड़ा जिससे एक लाख लोग और मरे। एकसाथ इतने लोगों को मारने वालों को कोई सजा नहीं दी गई, बल्कि ये शांतिदूत बन गए। और-तो-और, इन्होंने उसी साम्यवाद के खिलाफ मोर्चा खोल दिया जिसने हिटलर से मुक्ति दिलाई। वियतनाम, ईराक, व अफगानिस्तान जैसे कमजोर देशों को दबाकर रखना चाहा पर वहां के लोगों से ये जीत नहीं पाए। सोवियत संघ का विघटन एक साजिश के तहत था जिसमें इनका पिटठू बोरिस येलसिन शामिल था, जिसने कम्युनिस्ट पार्टी और गरवा चौफ को धोखा दिया था। कई मंत्री भी साजिश का हिस्सा थे। इन उपनिवेशियों का उद्देश्य अन्य देशों की सरकारों को कर्जे में रखने का है, जिससे वे कभी उभर नहीं पाए और धीरे-धीरे इन देशों के सनसाधन, उद्योग और नीतियां इनके नियंत्रण में आ जाते हैं। देशों की स्वायत्तता खत्म हो जाती है और वे इन देशों की ऐसी कठपुतली बन जाते हैं जो जब नाचने से मना कर दे तो उन्हें काट कर फेंक दिया जाता है, या भीतरी विद्रोह करवा कर नष्ट कर दिया जाता है, जिससे फिर से उभरने के लिए वे इनकी पूंजी के मोहताज हो जाएं।

अमेरीका के खुफिया विभाग सैंट्रल इंटेलिजेंस एजेंसी (सी. आई. ए. – CIA) के ही गोपनीय दसतावेजों से यह खुलासा हुआ है, कि वही श्वेत पूंजीपतियों का समूह, जिसने उपनिवेशवाद के जरिए दुनिया पर कब्जा किया था, अब फिर से श्वेत नस्ल की सर्वोच्चता के लिए पूरी तरह से सक्रीय हैं। इन देशों में इंग्लैंड, अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, कनाडा सहित, यूरोप के उपनिवेशवादी देश, जैसे कि, फ्रांस, जर्मनी, स्पेन, पोलैंड, आस्ट्रिया, नॉर्वे, हाॅलैंड, आदि, शामिल हैं। शिक्षा, तकनीक, उच्च मुद्रा मूल्य, क्षेत्रीय संघर्ष करा के शास्त्रों का व्यापार, और मीडिया, इनके उपकरण हैं। इंटर्नेट, उपग्रहों से निगरानी और सांस्कृतिक गतिविधियां इनके जासूसी के उपकरण हैं। हाल ही के दिनों में, महिलाओं को उद्योगों में कर्मी बना कर परिवार और समाज तोड़ कर पुरूष को कमजोर करना, समलैंगिकता को संस्कृति बना कर प्रजनन दर कम करने के साथ विद्रोह की भावना घटाना, ड्रग्स और हथियारों से, संपन्न परिवारों की संतानों को खत्म करना और बच्चों को गेमिंग के जरिए सव सम्मोहित रख कर काल्पनिक दुनिया में रखना जिससे वे युवा अवस्था में भी बालपन वाले दिमाग में रहे और गंभीर और समझदार नहीं हो पाएं। ऐसा नहीं है कि ये सही में अपनी श्वेत नस्ल के सच्चे रखवाले होते हैं। नस्लवाद केवल इनका उपकरण है। इससे एक तो वे लोगों के झुंड में खुद को छुपा लेते हैं और साथ ही अपने बचाव के लिए एक फौज भी खड़ी कर लेते हैं। असल में, इनके सारे शोषण तंत्र के सबसे पहले शिकार और शोषण की प्रयोगशाला के सबसे पहले विषय, इनकी अपनी नस्ल वाले ही होते हैं। दुनिया में तीसरा विश्वयुद्ध इसलिए नहीं हुआ क्योंकि वह यूरोपीय नस्ल वालों के विरुद्ध ही होगा, क्योंकि शोषण की प्रयोगशाला में विद्रोह पहले नमुनों (सब्जैक्टस) द्वारा होगा। क्योंकि यदि वहां प्रयोग सफल हो जाता है, इसलिए बाकी दुनिया तो सिर्फ प्रयोग की सफलता को ही आगे बढ़ाते हैं।

मौजूदा दौर में डोनाल्ड ट्रम्प ऐसे ही उपनिवेशवादियों के सरदार हैं। इसलिए वह अपनी मर्जी चला पा रहे हैं। क्योंकि अन्य उपनिवेशियों को उनको अनकहा समर्थन मिल जाता है। इन उपनिवेशवादियों में जलन और विद्वेष बहुत होता है और ये किसी अन्य देश या क्षेत्र को आगे बढ़ते नहीं देख सकते। मौजूदा खाड़ी संकट इसी दुर्भावना का परिणाम है। वे इस क्षेत्र की तरक्की से जलते हैं। साथ ही भारत भी उनकी आंखों में कांटे की तरह चुभता है। ईरान तो बहाना है, भारत असली निशाना है। चीनी भी इनकी ही होड़ में है और इसलिए उनसे इनका संघर्ष निश्चित है। रूस से ये डरते हैं और वहाँ की सांस्कृतिक अन्य यूरोप से भिन्न है। अफ्रीका और दक्षिणी अमेरिकी को इन्होंने हर प्रकार से तोड़ रखा है।

एक महत्वपूर्ण पहलू है धर्म। पर मुझे ये राजनीति में सबसे भ्रमित पहलू लगता है। जहां तक श्वेत लोगों की बात है, तो उन पर भी इन पूंजीपतियों द्वारा धर्म को लादा जाता है, पर पूंजीपतियों के लिए धर्म केवल एक सस्ती सेना तैयार करने के उपकरण से अधिक और कुछ नहीं है। इसका उदाहरण यह है कि जब भारत में ईसाई मिशनरियों ने यहां के लोगों को शिक्षित करना शुरू किया तो वही श्वेत पूंजीपति घबरा गए, जो उन श्वेत ईसाई मिशनरियों को लेकर आए थे। उनकी घबराहट का कारण था कि यदि ईसाई मिशनरियों ने भारत के लोगों को प्रबुद्ध कर दिया तो वे लोग पूंजीपतियों के खिलाफ बगावत कर देंगे। इसके लिए उन्होंने ब्रिटेन की संसद में एक कानून भी पास करवा लिया जिससे ईसाई मिशनरियों का भारत में कदम रखना भी नामुमकिन हो गया और कई क्षेत्रों में उनकी प्रैस भी बंद कर दी गई। यह एक ठोस उदाहरण है कि धर्म को इस्तेमाल किया जाता है पर धार्मिक नजरिए से राजनीति समझना भ्रम है।

यह लेख विश्व की राजनीति के उस रूप को संक्षिप्त में बताता है जिसे न पढ़ाया या बताया जाता है। आशा है कि आप प्रचलित मीडिया और पुस्तकों से हट कर पहलुओं को समझेंगे। आपकी समझ आपके और आपके देश के भविष्य को सही राह दिखाएगी। – निखिल सबलानिया

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