कॉकरोच जनता पार्टी कहीं आम आदमी पार्टी के रास्ते पर तो नहीं जा रही? – निखिल सबलानिया Cockroach Janata Party Kahin Aam Adami Party ke Raste par To Nahin ja rahi? – Nikhil Sablania

कॉकरोच जनता पार्टी, यानी कि, सी. जे. पी. (CJP) अब ‘आम आदमी पार्टी’ की राह पर चल रही है। बेशक, लोगों में बीजेपी को लेकर बहुत गुस्सा था और प्रोटेस्ट में जिस तरह से हमारे देश के युवाओं पर लाठियां, पैलेट गन, गोलियां, बिजली के करंट की राॅड, आंसू गैस, नुकीले डंडे बरसाए गए और उन्हें प्रताड़ित किया गया, उससे अब प्रतिशोध की भावना और अधिक है। पर कोई भी काम प्रतिशोध या बदले की भावना से नहीं करना चाहिए और इसीलिए अब आपको नीचे बताई गई बातों को ध्यान से समझना और साझा करना है। 

जिस प्रकार से कॉकरोच जनता पार्टी ने बीजेपी से की गई मुलाकातों के बाद, बातों को केवल जुबानी आश्वासन पर छोड़ दिया और गृहमंत्री से लिखित एवं हस्ताक्षरित समझौता नहीं किया, इससे बीजेपी को भी मौका मिल गया कि वह अपने जुबानी वादों से मुकर जाए। परन्तु, क्या कॉकरोच जनता पार्टी और इनका साथ देने वाले अन्य दलों, जैसे कि, आम आदमी पार्टी, कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, आजाद समाज पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिव सेना, या अन्य दलों को बीजेपी का इतिहास नहीं पता था, कि यह तो पहले वायदे करते हैं और बाद में कहते हैं कि वह तो जुमला था। तो फिर कॉकरोच जनता पार्टी ने लिखित समझौता क्यों नहीं किया? 

अब यह पार्टी लोगों को वैसे ही, आम आदमी पार्टी की तरह और झांसा देने में लग रहे हैं, जैसे कि वेबसाइट बनाना और वकीलों की फौज खड़ी करना, आदि। जबकि सब जानते हैं, कि जो जो संगठन इनका साथ दे रहे हैं, वह पैसे वाले हैं और उनके पास तो पहले से ही वकीलों की फौज है, तो क्या वह फौजी इस नई पार्टी के लोगों और जो युवाओं को पुलिस ने पकड़ा है, उनके लिए नहीं है? 

कपिल सिब्बल जी ने कांग्रेस की तरफ से आतंकवादी कैसे में पकड़े गए अभिनेता, संजय दत्त जी का केस लड़ा था तो क्या इन युवाओं का केस नहीं लड़ सकते, या अपने वकीलों की जमात को नहीं कह सकते कि वे फ्री में कैसे लड़ें, या उन राजनीतिक पार्टियों से नहीं कह सकते जो कॉर्पोरेट कंपनियों से अरबों रूपये का चंदा लेती है? जबकि ऐसा लगता है कि एक करोड़ रूपया, कॉकरोच जनता पार्टी को केस लड़ने के लिए कपिल सिब्बल जी इसलिए दे रहे हैं, ताकि इससे भारत के लोग और विदेशों में बसे भारतीय भी प्रभावित हों, और वे भी बढ़ चढ़कर चंदा दे। इससे यह लग रहा है कि न केवल यह पार्टी, बल्कि पहले भी जब आम आदमी पार्टी आई थी और इस तरह से लोगों को प्रेरित करके, उनके धन और समय की लूट और उनकी भावनाओं से खेला गया था। यदि ऐसा है, तो ऐसा लगता है, कि कॉकरोच जनता पार्टी का मकसद केवल और केवल धन की लूट है और लोगों को गुमराह करना है। और साथ ही, क्योंकि यह दोनों आंदोलन पत्रकारों द्वारा चलाए गए हैं, तो क्या पत्रकारों, मीडिया और राजनैतिक दलों का कुछ ऐसा माफिया (सरगना) की तरह नैकसस (गठजोड़) काम कर रहा है जो इस तरह से आंदोलन के जरिए लूट मचा रहा है और सत्ता पर काबिज होकर और लूटता है? 

मौजूदा प्रोटेस्ट में भी कॉकरोच जनता पार्टी के धरने पर लोग तबतक नहीं गए थे, जबतक सोनम वांगचुक जी को पुलिस उठाकर नहीं ले गई थी। लेकिन जिस प्रकार से बीजेपी ने सोनम वांगचुक जी को धरना प्रदर्शन से अपमानित करते हुए उठाया था, उससे देश के लोगों की भावनाएं आहत हुई और उसके बाद वे बड़े हुजूम में जंतर मंतर पर, या अन्य जगहों पर धरने के लिए गए। अब यहां पर दो बातें भी और सामने आ रही हैं। वह यह हैं, कि जो सोनम वांचुक जी, लगातार बीजेपी के साथ काम करते रहे थे, आज अचानक बीजेपी से अलग कैसे हो गए? दूसरी बात यह, कि आंदोलन के बाद समझौते में की गई इतनी लापरवाही कोई नासमझी बताती है, या जानबूझकर बरती गई है। यदि यह जानबूझ कर बरती गई है, तो हो सकता हो कि बीजेपी भी इनके साथ शामिल हो, जिससे कि बीजेपी यह अजमा रही हो, कि भारत के युवा कहां तक उनका विरोध कर सकते हैं और कैसे आने वाले विरोधों को दबाया जा सकता है। ऐसे में तो यह तानाशाही को और मजबूत करने के लिए एक उपकरण और प्रयोग है, जो देश के लोगों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ करके किया जा रहा है। 

यह बात भी सोचने की है, कि जब कॉकरोच जनता पार्टी ने कांग्रेस, आम आदमी पार्टी, राष्ट्रीय जनता दल, शिव सेना और समाजवादी पार्टी, आदि, जैसी अनुभवी पार्टियों के साथ चर्चा की थी, तो उनके समझौते करने के तरीके में इतनी कमी कैसे आई, कि उन्होंने लिखित में समझौता नहीं किया। जिस बीजेपी को वह तीन महीनों से गद्दार और धोखेबाज कहते रहे थे, उस पर इतना भरोसा कैसे कर लिया? और जब प्रोटेस्ट में आम लोगों को पुलिस ने अरेस्ट कर लिया, तो अभी तक पार्टी प्रमुखों को अरेस्ट क्यों नहीं किया गया, जबकि, यदि पुलिस मानती है कि जिनको किसी अपराध में अरेस्ट किया गया उन्होंने अपराध किया है, तो कानून यह कहता है कि जिसने अपराध कराया या जिसने अपराध के लिए भड़काया या नमस्ते, वह भी उतना ही अपराधी है और अरेस्ट तो उसको भी करना चाहिए। पर पार्टी प्रमुखों को क्यों अरेस्ट नहीं किया गया? तो क्या इनको बीजेपी की बी-टीम बनाकर अपने प्रयोग करने के लिए खुला छोड़ गया है? 

साथ ही, आंदोलन में जब लोगों का गुस्सा ज्यादा नजर आया, और लोगों की बढ़ती एकता को देखकर बीजेपी को आगे चुनाव हारने का डर लगने लगा, तो बीजेपी ने ही एक कृत्रिम आंदोलन, आरक्षण के विरुद्ध छेड़ दिया है। यह बीजेपी के चुनावी मकसद को लेकर है। इससे लोगों का बहुमत जो आज बीजेपी के विरुद्ध बनेगा और आने वाले चुनावों में वह हारेंगे, वह बहुमत नहीं बन पाएगा और बीजेपी फिर से चुनाव जीत जाएगी।

ऐसे कई अन्य प्रश्न भी हैं जो भारत के लोगों के दिमाग में घूम रहे हैं। जैसे कि, बीजेपी के कई मंत्रियों के बच्चे प्रोटेस्ट में आए और उन्होंने बीजेपी की नीतियों का विरोध किया। हो सकता हो कि उनकी भावनाएं सच्ची हो, लेकिन यह भी हो सकता हो, कि प्रोटेस्ट को निष्पक्ष दिखाने के लिए, बीजेपी ने ही जानबूझकर उनको भेजा हो। यह संशय इसलिए है, क्योंकि यह एक ऐतिहासिक सत्य है, कि राजनीति षडयंत्रों से चलती है और भारत जैसे देश में बहुत कम ऐसा होता है कि बच्चे अपने अभिभावकों के खिलाफ आवाज उठाएं या बागी बन जाएं। 

इसलिए आम लोगों को जो भी कदम बढ़ाना है, बहुत सोच समझ उठाना है। हमारे पास लोकतंत्र का तरीका है, चुनावों का। लोग अपने संगठन बनाकर भी प्रोटेस्ट कर सकते हैं। अगर आपके मन में सरकार को लेकर कोई बात है, तो आप भारत में जगह-जगह अपने संगठन बनाकर प्रोटेस्ट करिए, आपको किसी हीरो की जरूरत नहीं है। आप अपने हीरो स्वयं ही हैं। सोशल मीडिया पर आपको एक ऐसा उपकरण मिला हुआ है जिससे आप अपनी बात पूरे देश एवं दुनिया में फैला सकते हैं। आप अपनी मीडिया टीम बनाएं, इसमें एक या दो लेखक हों, दो वीडियोग्राफर हो, एक एडिटर हो, दो सोशल मीडिया पर पोस्ट करने वाले हो, दो लेखक हो, एक वकील हो सलाह के लिए। और अगर दो लोग मार्केटिंग करेंगे तो आपके स्थानीय दुकानदारों के विज्ञापनों से आपको धन भी आ जाएगा। ऐसा करके आप देश के लिए अपने समय, संपर्कों और अपने हुनर को दीजिए। आज तो सीधा मोबाइल से रिकॉर्ड होकर फ्री में अपलोड भी हो जाता है और उससे पूरी दुनिया में बात फैल जाती है। इसलिए, न किसी पार्टी का मुंह देखें और न किसी मीडिया हाउस का। भारतीय संविधान ने आपको जो स्वतंत्रता दी है, उसका जल्द से जल्द फायदा उठाएं और अपनी स्वतंत्रता को बचाएं, ताकि यह स्वतंत्रता भी कल को खत्म न कर दी जाए। 

इसलिए, न तो बेवकूफ बना है और न ही दब्बू बनना है। न तो किसी हीरो का मुंह देखना है और न ही खुद को हीरो से कम समझना है। और सबसे जरूरी है आपका लोकतंत्र, जैसे आप अपनी चीजों की रक्षा खुद करते हैं, ऐसे ही आपको अपने लोकतंत्र की रक्षा भी खुद करनी है। कॉकरोच जनता पार्टी और इसके सदस्यों को भी यह बात ध्यान में रखनी चाहिए, कि जैसे पहले आम आदमी पार्टी ने भारत और भारत के बाहर के लोगों को बेवकूफ बनाकर अपना उल्लू सीधा किया, यदि ये भी इसी राह पर चलेंगे, तो कहीं ऐसा न हो कि जो लोग पहले से ही भटकाने पर, आम आदमी पार्टी पर क्रोधित थे, अबकी बार उनका गुस्सा कहीं कॉकरोच जनता पार्टी के संस्थापकों एवं अन्य सदस्यों पर भी न टूट पड़े। इसलिए, आंदोलन चलाने वाले और आंदोलन करने वाले, अपने पूरे दिमाग एवं सूझबूझ से ही आगे कोई काम करें। मनुष्य वस्तु नहीं है और जिस मनुष्य के हृदय में प्रेम होता है वह किसी वस्तु को भी मनुष्य या कई बार तो देवता के समान सम्मान देकर भी उसका ध्यान रखना है। इसलिए मनुष्यों की भावनाओं से किसी भी प्रकार का कोई खिलवाड़ नहीं होना चाहिए। 

जहां तक बीजेपी की नेताओं की बात है, तो इस पर मैं भगवान बुद्ध की शिक्षा को मानता हूं, कि ‘क्षमा’ कर देना चाहिए। आपके पास चुनाव का जरिया है और आप बहुमत से उनको हटा सकते हैं। पर केवल सत्ता को परिवर्तित करना ही आपका लक्ष्य नहीं होना चाहिए। इसीलिए, मैंने इस लेख की शुरुआती पंक्तियों में ही लिखा है, कि कोई भी काम बदले की भावना से नहीं करना है। आपको ठंडे दिमाग से काम करना है और फिर ऐसे नए कानून बनाने हैं जिससे कि आने वाले समय में जो भी सरकार में आए, उनके पास ऐसी किसी भी बात तो करने की संभावनाएं न्यूनतम रह जाएं, जिससे भारत का लोकतंत्र कमजोर होता है और भारत की अर्थव्यवस्था निजी हाथों में जाती है।

इसलिए आपका रास्ता बहुत लंबा है और आपको बहुत काम करना है। आपको पूरी दुनिया के कानून पढ़ते हैं, पूरी दुनिया का इतिहास पढ़ना है और अपनी संस्थानों में सुधार लेकर आना है। और जो सबसे महत्वपूर्ण और सबसे बड़ा काम आपको करना है, वह यह कि इंसान में नैतिकता का स्थायी, ठोस, शाश्वत, चिरस्थायी, एवं अनंत विकास कैसे उत्पन्न हो। क्योंकि, जब तक नैतिकता को मानवीय मूल्य का आधार नहीं बनाया जाएगा, तब तक मनुष्य गलत रास्ते पर ही जाएगा। पर फिर भी, गलत रास्ते पर गए हुए मनुष्य को सुधारने के लिए पहले उसे क्षमा करके सही रास्ता दिखाना ही पड़ेगा। 

इसलिए, आपका हर आंदोलन एक बौद्धिक और मानवीय आंदोलन होना चाहिए, कोई बदला लेने का आंदोलन नहीं। ठीक बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर जी की तरह, कि उन्होंने किसी तलवार से नहीं बल्कि अपनी बुद्धि और कलम से इस देश के हजारों सालों की रूढ़िवादी व्यवस्थाओं को पराजित किया। पर साथ ही, जो लोग सत्ता में बैठकर शोषण करते हैं, उन्हें यह भी याद रखना चाहिए, कि उन्हीं बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव आंबेडकर जी ने, यह भी लिखा है, कि यूरोप में कभी भी लोगों को हथियारों से अलग करके भारत की तरह, हथियारों को रखने के लिए एक विशेष वर्ग बनाकर, किसी क्रांति से वंचित नहीं किया गया। और भारत में सिर्फ एक वर्ग को ही हथियार थमा कर बाकी सभी वर्गों के लोगों के पौरूष को, वर्ण व्यवस्था ने दबा दिया। और बाबासाहेब जी ने बेशक साम्यवादी तरीके को तब नहीं अपनाया, लेकिन यदि भविष्य में कोई ऐसी तानाशाही बैठ जाए, जिसे हटाने के लिए साम्यवादी या अन्य कोई क्रांतिकारी तरीका अपनाया जाए, तो उसे भी उन्होंने स्वीकारा है। साथ ही, बाबा साहेब आंबेडकर जी ने राजनेताओं को समझाया है, कि लोकतंत्र में चुनावों का रास्ता खूनी-क्रांति या रक्तिम आंदोलनों को रोकने के लिए बना है। पर यदि सत्ताधारी लोग चुनावों को इस प्रकार प्रभावित कर देंगे, कि लोगों का इन पर से भरोसा ही उठ जाए, तो ये खुद ही खूनी-क्रांतियों को आमंत्रित कर रहे हैं। 

इसलिए, लोगों के पास शांतिपूर्ण रास्ता तो है ही, लेकिन अन्य रास्ते भी खुले हैं और भारत का संविधान भी यह नहीं कहता, कि कोई सरकार यदि पूरी तरह से तानाशाही पर उतर आए तो लोग शांतिपूर्ण आंदोलन को छोड़कर अन्य कोई रास्ता नहीं अपना सकते। क्योंकि, संवैधानिक नैतिकता और सीमा, केवल आम लोगों पर ही नहीं है, बल्कि, सत्ता में बैठे लोगों पर भी है। और संवैधानिक नैतिकता और सीमा तब तक ही लागू होती है, जब तक कि सत्ता में बैठे हुए लोग उस नैतिकता और सीमा के दायरे में रहकर कार्य करते हैं या दुरुपयोग नहीं करते। पर यदि सत्तारूढ़ अपनी लक्ष्मण रेखा खुद ही उलांघते हैं, तो फिर वह लोगों से भी किसी तरह की संवैधानिक नैतिकता और सीमा का पालन करने के लिए नहीं कह सकते। क्योंकि संवैधानिक नैतिकता और सीमा को उंघाल कर ही, सत्तारूढ़ लोगों ने, खुद ही अराजकता फैलाई है। और किसी भी अराजकता वाले क्षेत्र के लोगों को यह पूरा अधिकार है कि वह एक सही सत्ता का निर्माण करें और उस सत्ता के निर्माण के लिए वे स्वयं ईश्वर से भी स्वतंत्र है। 

दुनिया में कभी भी, कोई ईश्वर भी, किसी ऐसे आंदोलन को रोकने के लिए बीच में नहीं आया जहां सत्तारूढ़ तानाशाही और अत्याचारी को लोगों ने किसी भी तरीके का इस्तेमाल करके हटाया हो। भारत के अधिकांश लोगों का हिंदू धर्म तो खुद ही कहता है, कि जब-जब अधर्म का राज होगा, तो उसे खत्म करने के लिए ईश्वर किसी मनुष्य के रूप में खुद अवतार लेते हैं। राम का क्रांतिकारी युद्ध, पांडवों और कृष्ण के क्रांतिकारी युद्ध, चंद्रगुप्त मौर्य और अशोक के क्रांतिकारी युद्ध, ईसाई धर्म के क्रांतिकारी युद्ध, पैगंबर मोहम्मद के क्रांतिकारी युद्ध, इंग्लैंड का गृह युद्ध, अमेरिका का गृह युद्ध, रूस का बोल्शेविक युद्ध, द्वितीय विश्व युद्ध में हिटलर का संहार, भारत की स्वतंत्रता का आंदोलन, अरब, अमेरिकी उपमहाद्वीपों और अफ्रीकी देशों की क्रांति, चीन का गृह युद्ध, वियतनाम का युद्ध, कोरिया का युद्ध, इराक युद्ध, अफगानिस्तान का युद्ध, चेचन्या की क्रांति और हाल ही में ईरान का युद्ध, यह बताते हैं कि लोगों ने तानाशाही के खिलाफ एक होकर दुनिया के बड़े-बड़े राष्ट्रों को भी हरा दिया। इसलिए सत्तारूढ़ लोगों को यह इतिहास याद रखना चाहिए, की दुनिया में महावीर, बुद्ध, रविदास, नानक, तुकाराम, यीशु की बौद्धिक क्रांति तो है, पर साथ ही रक्तिम क्रांतियों के आंदोलन भी मौजूद हैं। इसलिए कोई भी सत्तारूढ़ दल ऐसे आंदोलन को आमंत्रण न दे। और यदि सत्तारूढ़ दल यह बात अच्छे से समझ ले, कि उनको मानवता का विकास करना है, तो ऐसे काम ही नहीं करेंगे जिससे कि ऐसी कोई स्थिति उत्पन्न हो और मानवता के इतिहास में एक और रक्तिम अध्याय लिखा जाए। 

इसलिए, सही पथ अपनाना सत्तारूढ़ लोगों का कर्तव्य है। केवल किसी मार्ग का नाम ‘राज पथ’ से बदलकर ‘कर्तव्य पथ’ रख देने से ही आप अपने कर्तव्य के निर्वाह करने वाले नहीं बन जाते। न ही तो सारे राजा अपने कर्तव्य से हटे थे। यदि चंद्रगुप्त मौर्य, अशोक, विक्रमादित्य और महाराणा प्रताप जी से सीख लेते, तो राजधर्म का सही से पालन करते और खुद का असली चेहरा छुपाने के लिए नकली चेहरा नहीं लगते हैं। मन में किसी तानाशाही राजा बनने का सपना पाले हों और भला दिखाने के लिए खुद को कर्तव्य पलाक शासक बताएं, तो इससे असलियत बदल नहीं जाती। इसलिए कथनी नहीं, बल्कि करनी पर ध्यान दें। – निखिल सबलानिया 

निखिल सबलानिया एक लेखक, फिल्म निर्देशक और कानून, मनोविज्ञान और सिनेमा की शिक्षा में तीन विषयों में स्नातक और स्नातकोत्तर, एवं, सत्रह वर्षों से लोक कल्याण और देश की अर्थव्यवस्था पर लोगों को शिक्षित कर रहे हैं। 

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