भारतीय जनता पार्टी ने भारत के प्रधानमंत्री मोदी के तीसरे कार्यकाल का जश्न मनाया। वहीं, अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप चौथी बार चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहे हैं। जब मोदी प्रधानमंत्री बने, तो उन्होंने खुद को भारत के संविधान निर्माता डॉ. बी.आर. अंबेडकर का अनुयायी बताया। डॉ. अंबेडकर को कोलंबिया यूनिवर्सिटी ने अपनी 250वीं वर्षगांठ के जश्न के दौरान अपने शीर्ष पूर्व छात्रों और प्रभावशाली विद्वानों की खास सूची में शामिल किया था। लेकिन यहाँ अमेरिका के पहले राष्ट्रपति जॉर्ज वाशिंगटन के बारे में उनकी एक दिलचस्प बात है, जिसके बारे में दोनों नेताओं को पता होना चाहिए।
जॉर्ज वाशिंगटन ने 1796 में तीसरी बार चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था, जिससे दो कार्यकाल की सीमा तय करने की ऐतिहासिक परंपरा शुरू हुई। उन्होंने पद इसलिए छोड़ा क्योंकि वे बूढ़े हो चुके थे और सार्वजनिक जीवन से थक गए थे; वे यह साबित करना चाहते थे कि यह पद किसी एक व्यक्ति का नहीं बल्कि जनता का है, और वे राष्ट्रपति पद को राजशाही जैसा बनने से रोकना चाहते थे।
22 दिसंबर 1952 को दिए गए एक मशहूर भाषण, जिसका शीर्षक था ‘लोकतंत्र के सफल कामकाज के लिए पूर्व-शर्तें’ (Conditions Precedent for the Successful Working of Democracy), डॉ. बी.आर. अंबेडकर ने जॉर्ज वाशिंगटन के रिटायरमेंट का ज़िक्र किया था। उन्होंने बताया कि अमेरिकी लोगों के लिए वाशिंगटन असल में एक “भगवान” की तरह थे। फिर भी, जब उनका कार्यकाल खत्म हुआ, तो लोकतंत्र के नियमों को बनाए रखने के लिए वाशिंगटन ने दोबारा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया। जैसा कि डॉ. अंबेडकर ने लिखा और बताया है, वाशिंगटन ने अपने नागरिकों को उनके संवैधानिक मकसद की कड़ी याद दिलाई थी:
“मेरे प्यारे देशवासियों, आप उस मकसद को भूल गए हैं जिसके लिए हमने अपना संविधान बनाया था। हमने यह संविधान इसलिए बनाया क्योंकि हमें न तो कोई राजा चाहिए, न कोई तानाशाह, और न ही ऐसा राष्ट्रपति जो जीवन भर शासन कर सके। अगर आप बार-बार मुझे इस पद के लिए चुनते हैं, तो क्या आप उसी सिद्धांत के खिलाफ नहीं जा रहे जिसे हमने स्थापित किया था—कि हमें राजा नहीं चाहिए?”
डॉ. अंबेडकर ने इसका ज़िक्र क्यों किया?
राजनीति के नियमों का पालन: डॉ. अंबेडकर ने इस प्रसंग का इस्तेमाल यह ज़ोर देने के लिए किया, कि एक सफल लोकतंत्र में नेताओं और नागरिकों को बिना लिखे नियमों, परंपराओं और निष्पक्ष व्यवहार का सम्मान करना चाहिए—भले ही कोई नेता बहुत ज़्यादा लोकप्रिय क्यों न हो।
नायक-पूजा (Hero-Worship) का खतरा: उन्होंने चेतावनी दी कि भक्ति या हीरो-पूजा के कारण किसी एक शक्तिशाली व्यक्ति को आँख बंद करके बार-बार चुनना तानाशाही का रास्ता बनाता है। – निखिल सबलानिया, लेखक – दलित की गली, बुद्ध का पथ, डॉ. भीमराव आंबेडकर और बौद्ध धम्म, डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की सचित्र कथा और कथन, अनुवादक – श्रम का विभाजन और निर्माण (कार्ल मार्क्स), अछूत और ईसाई धर्म, जाति का संहार, भारत में जातियाँ, शूद्र कौन थे और वे भारतीय आर्य समुदाय में चौथा वर्ण कैसे बनें (सभी – डाॅ. भीमराव आंबेडकर)