मेरी भारत के सभी लोगों से पूरी संवेदना है और मैं उनके साथ हूँ। पर उनको कुछ बात और भी समझनी चाहिए। और खासकर उन्हें बात समझनी चाहिए जो एकदम से कांग्रेस से बड़ी आशा लगा रहे हैं। इतना बड़ा प्रोटेस्ट कोई साधारण घरों के बच्चों से या युवकों से नहीं होता। यह सारे उन घरों के बच्चे हैं जिनके परिवार वाले या रिश्तेदार या तो पहले से नेता थे और पार्टियों से जुड़े होते हैं या काफी प्रभावशाली होते हैं। यह बात ठीक है कि लोगों को बीजेपी पसंद नहीं है और उनको जरिया चाहिए अपनी बात रखने का जो उन्हे हाल की प्रोटेस्ट से मिला। लेकिन बड़ी पार्टी के सपोर्ट से और अच्छा खासा रुपया लगाकर किसी को भी आगे कर दो और कई महानुभाव और इनफ्लुएंशल भी उनको अगर हीरो बनाने लगे, तब तो इस देश के लोगों का पूरा बेड़ागर्क होगा। शिकार सिर्फ एक शिकारी से छूटकर दूसरे शिकारी के पास जाएगा। और आप गैर राजनीतिक समझ के ऐसे लोगों को हीरो बनाकर, उसके शिकार के लिए उसका रस्ता तैयार कर रहे हैं, न कि उसे आजाद कर रहे हैं। यानी कि, यह लोगों की स्वतंत्रता का रास्ता नहीं है, कि आप सिर्फ किसी को हीरो बना दो, बल्कि, यह लोगों को और फंसा देगा. क्योंकि इनके पीछे ऐसी बड़ी राजनीतिक पार्टियां होती हैं, जो पहले से शोषण करती आई हैं और आज सत्ता में नहीं आ पा रहीं। और जैसे कि दो हजार चौदह की मोदी लहर बनी थी, तो सब ने कहा था कि कोई भी बीजेपी से चुनाव के लिए खड़ा होता तो आसानी से जीत जाता। धनबल से किसी को आगे करके प्रसिद्ध किया जा सकता है, लेकिन इससे उसकी राजनीतिक सोच और मंशा न पता चलती है और न सिद्ध होती है। वह केवल पिछले तानाशाह या क्रूर शासक की कठपुतली ही होता है। मैंने बीस सालों में ऐसे बहुत से युवक देखे हैं जो ऐसे राजनीतिक आंदोलन चलाते हैं और बाद में या तो मोटी आय वाली नौकरियों में चले जाते हैं, या राजनीतिक पार्टियों में सेट हो कर अपना उल्लू सीधा करते हैं। इसलिए आप गौर करिए कि बीजेपी से मुक्ति पाने का मतलब यह नहीं है, कि कांग्रेस को सिर पर ला कर बैठा दें। कांग्रेस एक ऐसा शिकारी है जो शिकार के पंजे में आने का बस इंतजार कर रहा है। टाटा बिड़ला अंबानी अडानी इंफोसिस मोदी डालमिया बजाज, ऐसे कई सारे पूंजीपति कांग्रेस की देन है। डिसइनवेस्टमेंट, प्राइवेटाइजेशन, शिक्षा का निजीकरण, कॉन्ट्रैक्ट बेस नौकरियां, पेंशन खत्म करना, आदि, सामाजिक कल्याण के कार्यक्रमों को खत्म करना और राष्ट्रीय कंपनियों को निजी हाथों में देना, यह सब कांग्रेस का काम था। जीएसटी, कांग्रेस लाना चाहती थी, जिसके बाद में आने पर छोटे व्यापार खत्म हुए और राज्यों की टैक्स कलेक्ट करने की शक्ति कमजोर हुई, जिससे अधिक शक्ति केंद्र सरकार के पास चली गई और राज्य केंद्र सरकार के मोहताज बने। विदेशी मुद्रा कांग्रेस लेकर आना चाहती थी, जिससे भारत के व्यापार ठप्प हों। कई ऐसे सेक्टर जिनमें लोग सीधा हाथों के काम से जुड़े थे उसमें विदेशी मुद्रा निवेश लाकर कांग्रेस ने व्यवसायों को तभी कमजोर कर दिया था जिससे हजारों घरेलू उद्योग बंद हो गए थे। बहुत से व्यापारी कांग्रेस के समय में चीन में जाकर सेट हो गये थे पर कांग्रेस ने उस समय नहीं रोका। भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर कांग्रेस के समय कमजोर हो गया और चीनी सामान भारत के बाजार में आ गया था, लेकिन कांग्रेस ने उस पर भी कोई काम नहीं किया, कि भारत का मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर मजबूत हो। कांग्रेस के समय में सरकारी स्वास्थ्य सेवाएं एकदम चरमराई हुई थी। कॉमनवेल्थ, कोयला और 2G घोटाले सब कांग्रेस के समय में हुए। कांग्रेस के समय में कई दलित और पिछड़े वर्ग के छात्रों ने आत्महत्या की और कांग्रेस चुप रही। कांग्रेस के समय में जंतर मंतर पर होने वाले किसी भी आम लोगों के प्रोटेस्ट को मीडिया कभी कवर नहीं करती थी। कांग्रेस ने झुग्गी झोपड़ी कालोनियां बसाकर अधिकांश दलितों को इस तरह आधुनिक व्यवस्था में शहरों में कैद कर दिया, कि वह सदा के लिए उनके पूंजीपतियों के और उनके घरों के अंदर नौकर बन रहे और ऐसे कांग्रेस ने वर्ण व्यवस्था पूरी की पूरी ज्यों कि त्यों रखी। बीजेपी को तो हटाना है पर इसका मतलब यह नहीं है कि कांग्रेस सिर पर बैठ जाएगी फिर से। 80 और 90 के दशक की जितनी भी फिल्में बनी थी उनके खलनायक कांग्रेस के लीडर्स के प्रतिबिंब ही होते थे। हां आज बीजेपी ने उनका वही खलनायक वाला स्थान ले लिया है। लेकिन, लोकतंत्र में एक और चीज होती है, कि कलेक्टिव बार्गेनिंग, यानी कि, सामूहिक तौर पर आप सरकार से अपनी मांगों के लिए समझौते करते हैं। और अगर एक सिविल सोसाइटी, एक सभ्य समाज को सरकार के अंदर अच्छी भागीदारी चाहिए तो उसे किसी भी पार्टी की सरकार में वह बारगेनिंग करनी आनी चाहिए। मौजूदा समय में लोगों ने आवाज उठानी एकदम ही बंद कर दी। यह लोगों की भी तो कमी है कि वह क्यों इतने डरपोक बन गए। खुद इतना डरपोक बन गए कि अगर आप बीजेपी के खिलाफ सोशल मीडिया पर एक पोस्ट भी करो तो उस पर लाइक भी नहीं करते थे। बीजेपी ने लोगों को उठा उठा कर सिर्फ इसलिए जेल में डालना शुरू कर दिया कि किसी नेता का कार्टून बना और लोगों ने तब भी अपनी आवाज सही से नहीं उठाई। लोग इतना डरपोक बन गए कि गौ रक्षक दल जाकर कहीं भी किसी को मारे, या चर्चा पर हमले करें, या मुसलमान को मारे तो वह उसका विरोध नहीं कर रहे थे। इसलिए मुद्दा यह भी है, कि भारत का व्यक्ति न केवल डरपोक है, बल्कि निहायती स्वार्थी है और अपनी जाति, धर्म और प्रांतवाद की जंजीरों में जकड़ा हुआ है। इसी की वजह से राजनीतिक पार्टियां तानाशाही में बदल जाती हैं। इसलिए जो सबसे बड़ा काम इस देश में करना है, वह यह करना है कि इस देश के लोगों को बहादुर और निस्वार्थ बनाना है। न कि उन्हें एक पार्टी के चंगुल से छुड़ाकर दूसरी पार्टी के लिए चारा बनाकर भेजना है। उनको मनुष्य बनाना है, भेड़ नहीं बनाना। अगर हमने उनको भेड़ बनाकर रखा तो आज एक वहशी उनका शिकार कर रहा है तो कल को दूसरा वहशी भी उनका शिकार करेगा। – निखिल सबलानिया by Nikhil Sablania
निखिल सबलानिया, लेखक – दलित की गली, बुद्ध का पथ, डॉ. भीमराव आंबेडकर और बौद्ध धम्म, डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की सचित्र कथा और कथन, अनुवादक – श्रम का विभाजन और निर्माण (कार्ल मार्क्स), अछूत और ईसाई धर्म, जाति का संहार, भारत में जातियाँ, शूद्र कौन थे और वे भारतीय आर्य समुदाय में चौथा वर्ण कैसे बनें (सभी – डाॅ. भीमराव आंबेडकर)