जो लिख रहे हैं कि मायावती जी मिलने के पांच लाख लेती हैं और टिकट के साढ़े तीन करोड़, तो उन्हें यह भी पता होना चाहिए कि चुनाव के अंदर टिकट हर पार्टी पैसे लेकर ही देती है क्योंकि बिना पैसों के पार्टी नहीं चलती और मायावती जी से मिलने के पांच लाख तो कम है, क्योंकि कम-से-कम वह ₹5 लाख लेकर मिलती तो होंगी, पर बड़े नेता तो इतने में भी नहीं मिलते।
तो जब दुनिया ऐसी ही चल रही है तो इसमें मायावती जी पर उंगली क्यों उठा रहे हो? और यह बात भी सबके सामने हैं कि चुनाव में कितना भारी खर्च होता है। आगामी उत्तर प्रदेश चुनाव में कम-से-कम दस हजार करोड़ रुपए का खर्चा होगा। अगर 5 करोड़ रुपए भी एक कैंडिडेट देता है तो 400 सीटों से ज्यादा-से-ज्यादा दो हजार करोड़ रूपया ही आएगा। अब सोचो कि दो हजार करोड़ में खाली उत्तर प्रदेश का चुनाव लड़ा जाए, या पार्टी को राष्ट्रीय स्तर पर खड़ा किया जाए, या पार्टी के सारे देश में ऑफिस खोले जाएं, या पार्टी के होर्डिग लगाए जाएं, या पार्टी के विज्ञापन कराए जाएं, या पार्टी को आगे करने के लिए मीडिया में पैसा डाला जाए, या अखबारों में पैसा डाला जाए? क्या-क्या करेंगे इतने कम रूपयों में?
आज की राष्ट्रीय राजनीति करने के लिए कम-से-कम पचास हजार करोड़ रुपए जेब में होने चाहिए। हाल ही में बीजेपी के तमिलनाडु के एक नेता ने पार्टी छोड़ने की बात की तो आर. एस. एस. के नेता ने कहा कि अपनी पार्टी बनाने के लिए इनके पास एक हजार करोड़ रुपये होंगे। यानी कि, आर. एस. एस. जैसा संगठन भी यह स्वीकार करता है कि एक राज्य में ही पार्टी के लिए हजारों करोड़ रूपया चाहिए होता है। अब जरा विभिन्न पार्टियों को कोर्पोरेट कम्पनियों से प्राप्त धन पर नजर डालें।
1. टाटा समूह
टाटा समूह ने पिछले पंद्रह वर्षों में भारत में राजनीतिक दलों को ₹1,800 करोड़ ($215 मिलियन) से अधिक का दान दिया है। यह राशि मुख्य रूप से उनके कॉर्पोरेट चुनावी फंडिंग वाहन, प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से दी गई है। इस फंडिंग का सबसे बड़ा हिस्सा भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला है, जबकि शेष राशि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस और विभिन्न क्षेत्रीय दलों को दी गई। इन योगदानों से जुड़े मुख्य बिंदु नीचे दिए गए हैं:
2024-2025 का योगदान: आम चुनावों से ठीक पहले, ट्रस्ट ने 10 राजनीतिक दलों को ₹914.9 करोड़ वितरित किए। इसमें से भाजपा को ₹757.6 करोड़ (लगभग 82%) और कांग्रेस को ₹77.3 करोड़ मिले। शेष धनराशि छोटे क्षेत्रीय दलों में बांटी गई।
2018-2019 का योगदान: 2019 के लोकसभा चुनावों से पहले, ट्रस्ट ने दलों को ₹454 करोड़ से अधिक वितरित किए। इसमें भाजपा को सबसे बड़ा हिस्सा (लगभग ₹356 करोड़) मिला, जबकि कांग्रेस और तृणमूल कांग्रेस को छोटे हिस्से मिले।
विवाद: इलेक्टोरल ट्रस्ट की रिपोर्ट सामने आने के बाद, इन कॉर्पोरेट दानों ने मीडिया का काफी ध्यान खींचा। विश्लेषकों ने इस फंडिंग के समय पर सवाल उठाए—जैसे अप्रैल 2024 में भाजपा को दिया गया ₹758 करोड़ का दान, जो केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा टाटा समूह के सेमीकंडक्टर प्रोजेक्ट्स को मंजूरी देने के कुछ ही हफ्तों बाद आया था।
2. लार्सन एंड टुब्रो (L&T)
लार्सन एंड टुब्रो (L&T) ने पिछले बीस वर्षों में भारत में राजनीतिक दलों को कम से कम ₹585 करोड़ का योगदान दिया है। यह राशि सीधे चुनावी बॉन्ड (Electoral Bonds) और कॉर्पोरेट चुनावी ट्रस्ट (Electoral Trusts) के माध्यम से दी गई है। इस फंडिंग का एक बहुत बड़ा हिस्सा मुख्य रूप से भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को मिला है। चूंकि L&T नियमित रूप से कई सहायक कंपनियों (subsidiaries) के तहत काम करती है, इसलिए इसके राजनीतिक वित्तपोषण का रिकॉर्ड दो अलग-अलग तरीकों से सामने आता है:
1. ज्ञात दानों का विवरण
₹500 करोड़ ट्रस्ट फंडिंग (2024-2025): सुप्रीम कोर्ट द्वारा चुनावी बॉन्ड योजना को रद्द किए जाने के बाद, L&T ने कॉर्पोरेट ट्रस्ट के माध्यम से दी जाने वाली फंडिंग को काफी बढ़ा दिया। इसकी सहायक कंपनी, एलिवेटेड एवेन्यू रियल्टी एलएलपी (Elevated Avenue Realty LLP) (जिसे पहले L&T एवेन्यू रियल्टी के नाम से जाना जाता था) ने कॉर्पोरेट-समर्थित प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट (Prudent Electoral Trust) में ₹500 करोड़ का भारी योगदान दिया। इसके साथ ही L&T उस वर्ष इस ट्रस्ट को सबसे ज्यादा दान देने वाली कंपनी बन गई। प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट ने बाद में अपने पूरे फंड का 81% से अधिक हिस्सा सीधे भाजपा को ट्रांसफर किया।
₹85 करोड़ के सीधे चुनावी बॉन्ड (2018-2020): L&T उन चुनिंदा कंपनियों में से एक थी जिसने गुमनाम रहने के बजाय सीधे अपनी कॉर्पोरेट बैलेंस शीट में चुनावी बॉन्ड की खरीद की घोषणा की थी। स्टैंडअलोन फाइलिंग के अनुसार:
वित्तीय वर्ष 2018-19: ₹35 करोड़ के चुनावी बॉन्ड खरीदे गए।
वित्तीय वर्ष 2019-20: ₹50 करोड़ के चुनावी बॉन्ड खरीदे गए।
2. रणनीतिक समयरेखा और अनुबंध
प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट के माध्यम से L&T की राजनीतिक फंडिंग में आए इस बड़े उछाल ने वित्तीय निगरानी संस्थाओं का काफी ध्यान खींचा। विश्लेषकों ने रेखांकित किया कि यह बहु-करोड़ का राजनीतिक योगदान उसी समय के आसपास हुआ जब इस इंजीनियरिंग समूह को मध्य प्रदेश और असम जैसे भाजपा शासित राज्यों में ₹2,500 से ₹5,000 करोड़ के बड़े बुनियादी ढांचा (infrastructure) अनुबंध मिले थे।
3. वित्तीय प्रदर्शन ट्रैकिंग
लार्सन एंड टुब्रो की कॉर्पोरेट फंडिंग समयरेखा के साथ-साथ इसके पूंजी आवंटन और बाजार प्रदर्शन की निगरानी के लिए, आप इसके मार्केट ट्रेंड मेट्रिक्स देख सकते हैं।
3. आदित्य बिड़ला समूह
आदित्य बिड़ला समूह ने पिछले बीस वर्षों में भारत में राजनीतिक दलों को ₹1,300 करोड़ से अधिक का योगदान दिया है। कुमार मंगलम बिड़ला के नेतृत्व वाले इस औद्योगिक घराने ने अपने ऐतिहासिक जनरल इलेक्टोरल ट्रस्ट (जिसे बाद में एबी जनरल ट्रस्ट के नाम से जाना गया) और अब रद्द हो चुकी चुनावी बॉन्ड योजना (Electoral Bonds Scheme) के माध्यम से लगातार राजनीतिक वित्तपोषण किया है। इस कुल फंडिंग का विवरण तीन अलग-अलग चरणों में देखा जा सकता है:
1. चुनावी बॉन्ड योजना (2019-2024): लगभग ₹556 करोड़
सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद सार्वजनिक किए गए आंकड़ों के अनुसार, यह समूह अपनी विभिन्न प्रमुख सहायक कंपनियों के माध्यम से चुनावी बॉन्ड खरीदने वाले शीर्ष कॉर्पोरेट दाताओं में से एक बनकर उभरा:
एसेल माइनिंग एंड इंडस्ट्रीज लिमिटेड (Essel Mining & Industries Ltd): इसने ₹174.5 करोड़ से ₹224 करोड़ के बीच के बॉन्ड खरीदे।
बिड़ला कार्बन इंडिया प्राइवेट लिमिटेड: इसने ₹105 करोड़ के बॉन्ड खरीदे।
उत्कल एल्युमिना इंटरनेशनल और ग्रासिम इंडस्ट्रीज: इन्होंने कुल ₹556 करोड़ के शेष हिस्से का योगदान दिया।
मुख्य प्राप्तकर्ता:
केवल केंद्र सरकार को फंड देने वाले अन्य कॉर्पोरेट समूहों के विपरीत, इस समूह ने अपने बॉन्ड लगभग बराबर बांटे। उन्होंने ओडिशा में अपने बड़े खनन, धातु और रासायनिक हितों की सुरक्षा के लिए भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) को ₹285 करोड़ और बीजू जनता दल (बीजद) को ₹264.5 करोड़ दिए।
सार्वजनिक निगरानी संस्थाओं और खोजी रिपोर्टों ने रेखांकित किया है कि इस समूह द्वारा की गई बहु-करोड़ की बॉन्ड खरीद अक्सर बड़े नियामक (regulatory) फैसलों के समय के आसपास हुई। उदाहरण के लिए, समूह ने केंद्र सरकार द्वारा वोडाफोन आइडिया (Vi) के लिए ₹16,000 करोड़ के बड़े कर्ज-टू-इक्विटी पुनर्गठन राहत पैकेज को मंजूरी देने से ठीक दो महीने पहले ₹100 करोड़ के बॉन्ड खरीदे थे। (बता दें कि वोडाफोन आइडिया आदित्य बिड़ला समूह समर्थित एक टेलीकॉम संयुक्त उद्यम है)।
4. महिंद्रा समूह
महिंद्रा ग्रुप (जिसमें महिंद्रा एंड महिंद्रा और उससे जुड़ी इकाइयां शामिल हैं) ने राजनीतिक दलों को ₹200 करोड़ से अधिक का चंदा दिया है। महिंद्रा एंड महिंद्रा लिमिटेड ने सीधे ₹25 करोड़ के चुनावी बॉन्ड खरीदे थे, जिन्हें पूरी तरह से भारतीय जनता पार्टी (BJP) द्वारा भुनाया (redeem) गया था।
क. अब चुनावी बॉन्ड का दौर (2018-2024) देखते हैं:
यह भारतीय इतिहास में कॉर्पोरेट फंडिंग का सबसे बड़ा जरिया था। सुप्रीम कोर्ट द्वारा इस योजना को असंवैधानिक घोषित कर रद्द किए जाने से पहले, ₹16,500 करोड़ से अधिक के चुनावी बॉन्ड बेचे गए थे। कॉर्पोरेट खरीदार इस राशि का सबसे बड़ा हिस्सा थे और अकेले भाजपा ने जारी किए गए सभी बॉन्डों का ₹8,250 करोड़ से अधिक (50% से अधिक) हिस्सा भुनाया था।
ख. इलेक्टोरल ट्रस्ट का दौर (2013-वर्तमान):
प्रूडेंट इलेक्टोरल ट्रस्ट और प्रोग्रेसिव इलेक्टोरल ट्रस्ट जैसे प्रबंधित फंडों के माध्यम से कंपनियों ने अरबों रुपये ट्रांसफर किए हैं। चुनावी बॉन्ड पर प्रतिबंध लगने के बाद, ट्रस्ट के माध्यम से मिलने वाली फंडिंग केवल एक वर्ष (वित्तीय वर्ष 2024-25) में तीन गुना बढ़कर ₹3,811 करोड़ हो गई। इसमें से भाजपा को ₹3,112.50 करोड़ (82%) मिले, जबकि कांग्रेस को लगभग ₹298 करोड़ प्राप्त हुए।
ग. सीधे चेक और अज्ञात स्रोत (2006-2017):
चुनावी बॉन्ड योजना आने से पहले के दशक में, कंपनियां सीधे घोषित बैंक चेक के माध्यम से दान देती थीं। हालांकि, ADR India के ऐतिहासिक ऑडिट से पता चलता है कि राष्ट्रीय दलों ने इस 20 साल के दायरे में ₹10,753 करोड़ से अधिक की राशि पूरी तरह से “अज्ञात स्रोतों” (जैसे नकद कूपन या ₹20,000 से कम के छोटे दान) से भी जुटाई, जो कि पर्दे के पीछे के व्यावसायिक हितों से प्रेरित थी।
अब देखते हैं कि पिछले 20 सालों में किस पार्टी को कोर्पोरेट से कितना धन मिला :-
क. प्रमुख राष्ट्रीय दल
1. भारतीय जनता पार्टी (भाजपा): भाजपा कॉर्पोरेट फंडिंग की सबसे बड़ी लाभार्थी रही है। पिछले 20 वर्षों की समयरेखा में कुल कॉर्पोरेट दानों का लगभग 70% से 80% हिस्सा भाजपा को मिला है [ADR Report]। उदाहरण के लिए, वित्तीय वर्ष 2024-25 के चुनावी चक्र में भाजपा को अकेले ₹6,074 करोड़ मिले (जो सभी राष्ट्रीय दलों को मिले कुल दान का लगभग 91% था), और इस राशि का 92% से अधिक हिस्सा सीधे कंपनियों से आया था।
2. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): कांग्रेस के कॉर्पोरेट वित्तपोषण में भारी गिरावट आई है। हालांकि 2004 से 2012 के दौरान कॉर्पोरेट समर्थन के मामले में वह कड़ी टक्कर दे रही थी, लेकिन पिछले दशक में कुल कॉर्पोरेट फंड में उसकी हिस्सेदारी घटकर केवल 8% से 10% रह गई। नवीनतम आम चुनाव वाले वर्ष के दौरान कांग्रेस को कुल ₹517 करोड़ का दान मिला था।
ख. प्रमुख क्षेत्रीय दल:
तृणमूल कांग्रेस (TMC), बीजू जनता दल (BJD), और भारत राष्ट्र समिति (BRS) जैसे क्षेत्रीय दिग्गजों ने सामूहिक रूप से हजारों करोड़ रुपये जुटाए। कई बार इन दलों ने उन राज्यों में राष्ट्रीय विपक्षी दलों को भी पीछे छोड़ दिया जहाँ इनके पास खनन, रियल एस्टेट या बुनियादी ढांचा (infrastructure) के बड़े प्रोजेक्ट्स मौजूद थे।
अब देखें कि 2019-2024 के चुनावी बॉन्ड में किसने सबसे ज्यादा और किसे दिया:-
भारतीय चुनाव आयोग द्वारा अप्रैल 2019 से जनवरी 2024 के बीच खरीदे गए बॉन्ड के जारी आंकड़ों के अनुसार शीर्ष योगदानकर्ता इस प्रकार हैं:
राजनीतिक दलों द्वारा भुनाए गए कुल बॉन्ड का एक बड़ा हिस्सा कुछ राष्ट्रीय और क्षेत्रीय दलों के पास गया:
1. भारतीय जनता पार्टी (BJP): ₹6,060.5 करोड़।
2. अखिल भारतीय तृणमूल कांग्रेस (TMC): ₹1,609.5 करोड़।
3. भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस (INC): ₹1,421.9 करोड़।
4. भारत राष्ट्र समिति (BRS): ₹1,214.7 करोड़।
बहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) की स्थिति –
बहुजन समाज पार्टी (BSP) ने पिछले 20 वर्षों में इलेक्टोरल बॉन्ड के जरिए ₹0 (एक भी रुपया) प्राप्त नहीं किया है।
उपरोक्त तथ्यों से यह स्पष्ट है कि अधिकारिक आंकड़ों से ही यह स्पष्ट हो जाता है कि कार्पोरेट कंपनियों द्वारा राजनीतिक दलों को हजारों करोड़ रुपए के चांदे दिए जाते हैं। इसमें वह पैसा नहीं नजर आता जो काला धन होता है या वह जो नेता और अफसरों के बच्चों को कंपनियों में नौकरियाँ, हिस्सेदारी, ठेकेदारी या विदेशी फंडिंग से आता है। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में ही भारतीय चुनाव आयोग ने यह कहा था कि उन चुनावों में लगभग 50 से 60 हजार करोड़ रूपया खर्च हुआ था। अब तो इस बात को 12 साल बीत चुके हैं। आज के चुनाव तो खरबों रुपए के हैं। ऐसे में कार्पोरेट कंपनियां सिर्फ बीजेपी या कांग्रेस जैसी पार्टियों को ही चंदा देती हैं। बहुजन समाज पार्टी कॉर्पोरेट चंदा नहीं लेती, क्योंकि, बहुजन समाज पार्टी का यह सिद्धांत है, कि यदि इन कंपनियों से चंदा लिया गया, तो इन कंपनियों के हिसाब से काम करना होगा। बहुजन समाज पार्टी इसलिए जनधन के ऊपर ही अपना चुनावी प्रचार करती है। इसमें यदि कुछ लोग थोड़ा अधिक चंदा देते हैं तो इसमें कोई बुराई नहीं है। साथ ही यह बात भी सोचने की है, कि जब एक तरफ तो राजनीतिक दल कॉर्पोरेट से हजारों करोड़ रुपए के चंदे ले रहे हैं, तो फिर व्यक्तिगत लोगों को चंदा देने से क्यों रोका जा रहा है या वे गुप्त तौर पर क्यों देते हैं? समस्या यह नहीं है कि व्यक्तिगत रूप में लोगों को चंदा देने से रोका जाता है, पर असल में यदि ऐसे व्यक्ति सामने आते हैं तो मौजूद सत्ताधारी दल इन्कम टैक्स, इडी, सीबीआई, और पुलिस द्वारा उनको प्रताड़ित करते हैं, जिससे वे अन्य दलों को धन मुहैया न काराए। कानूनी संस्थाएं सत्तारूढ़ दल का हथियार बन गई हैं, जो राष्ट्रद्रोह के समान है। यही कारण है कि भारत में अन्य राजनीतिक दल पनप नहीं पा रहे हैं। धन का अभाव भारतीय राजनीति को गर्त में लेकर जा रहा है। इससे कमजोर और कमजोर हो रहा है। इसलिए, यदि बहुजन समाज पार्टी किसी भी तरह से धन जुटती है तो यह कोई गलत रास्ता नहीं है। कमजोर को आप दबा नहीं सकते यह कहकर, कि तुम्हारे पास हथियार नहीं है, जबकि, आप खुद तो कमजोर के सामने पूरे लाव लश्कर के साथ खड़े हो। यदि ऐसा है, तो यह भी लोकतंत्र का गला घोंटने के बराबर है। ऐसे में कमजोर के पास यह पूरा हक है, कि वह कैसे भी अपने हथियार, यानी कि धन जुटाए जिससे कि वह चुनाव जीत सके।
बाबासाहेब डॉक्टर भीमराव अंबेडकर जी ने भी अपने समय में यही कहा था, कि कांग्रेस ने इतना ज्यादा ध्यान राजनीति में घुसा दिया है जिससे भारतीय राजनीति इस प्रकार प्रभावित हुई है, कि कमजोर वर्ग अपनी बात भी नहीं रख सकते। कांशीराम जी ने भी अपने समय में यही बात कांग्रेस के लिए कही थी। और आज के समय में यही बात बीजेपी, कांग्रेस और तृणमूल, आदि, कई दलों के लिए भी लागू होती है।
इसलिए, इस बात से हताश या प्रभावित न हों, कि बहुजन समाज पार्टी को कौनसा धन कहां से आ रहा है और कितना आ रहा है। भारतीय राजनीति इस पूंजीवादी अर्थव्यवस्था में सिर्फ पैसे का एक महल है और कुछ नहीं है। लेकिन यदि गरीब को, यदि वंचित वर्गों को, राजनीति और सत्ता के केंद्र में लेकर जाना है, और विधान सभा और संसद में ले जाकर उनके लिए नए ऐसे कानून बनाने है जिससे कि उनका उद्धार हो सके, तो उसके लिए भी धन की जरूरत है।
चुनाव युद्ध का एक शांतिप्रिय तरीका है, लेकिन जैसे युद्ध में अत्यधिक धन की जरूरत होती है, ऐसे ही चुनाव में भी धन की जरूरत होती है। जैसे यूक्रेन आज युद्ध लड़ रहा है रूस से, जैसे ईरान अमेरिका से और फिलस्तीन इस्राइल से, ऐसे ही भारत के कमजोर दल, जैसे कि बहुजन समाज पार्टी को भी मजबूत दलों से लड़ने की जरूरत है। इसलिए, जैसे अमेरिका यूक्रेन की मदद कर रहा है और रूस ईरान की और ईरान फिलस्तीन की, ऐसे ही धन चाहे कहीं से भी आए लेकिन इसका फायदा सीधा-सीधा भारत के वंचित और गरीबों को जाएगा यदि बहुजन समाज पार्टी सत्ता में आती है। – निखिल सबलानिया
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