गांव – अदसड़, जिला-चन्दौली, उत्तर प्रदेश, तीन जिला – गाजीपुर और कैमूर (बिहार) बॉर्डर पर स्थित है। शहर से काफी दूर, नक्सलवाद प्रभावित, सर्वण बहुल गांव के शिक्षा विहीन परिवार में पैदा हुआ । पिता जी , राजकमल सिंह, माता जी, पुर्णवासी देवी, दो छोटे चाचा- रामटहल और शिवटहल, संयुक्त परिवार, हम सभी 9 भाई और 3 बहनें, मेरे अलावा कोई भी पढ़ाई कर सर्विस में बाहर नहीं निकल पाया। खेती गृहस्थी और पशुपालन में ही लगे रह गए।
*प्रारम्भिक शिक्षा*
गांव के ज्यादातर पेड़ की छांव में प्राथमिक सरकारी स्कूल से, पांचवीं बोर्ड परीक्षा प्रथम स्थान से पास किया। 3 किलोमीटर दूर स्थित मिडिल स्कूल अरंगी, उस समय के वाराणसी जिला में 25वां स्थान हासिल कर 1966 में 8वीं बोर्ड परीक्षा पास किया था।
1968 में 8 किलोमीटर दूर पैदल चलकर, हिन्दू इन्टर कॉलेज जमानियां गाजीपुर से हाईस्कूल, 1970 में 12वीं और फिर वहीं से 1972 में हिन्दू डिग्री कॉलेज जमनिया से B.Sc. पास किया।
*आज की तथा 50 साल पहले की परिस्थितियों को देखते हुए कुछ विवरण देना उचित समझता हूँ।*
मैं अपने खानदान का पहला व्यक्ति था, जो पढ़ाई शुरू किया था।
गरीबी, दिशा विहीन, अज्ञानता के कारण पढ़ाई से ज्यादा महत्व, घर गृहस्थी के कामों में सहयोग को दिया जाता था और मैं मन लगाकर काम करता भी था।
पता नही, उस समयकाल में किस मूर्ख ने, यह श्लोगन चलाया था कि –
*पढ़ले – लिखले होई अकाज*
*हर जोतले घरे आई अनाज*
करीब 8 किलोमीटर दूर पैदल चलकर आते-जाते समय पर ही मुझे पढ़ने का मौका मिलता था।
घरेलू काम की परिस्थितियों के कारण 11वीं में पहला लेक्चर अंग्रेजी का अटेंड नहीं कर पाता था। लिहाजा अंग्रेजी में कमजोर हो गया। अंग्रेजी में प्रमोटी एक्स्ट्रा नम्बर देकर 11वीं पास कर दिया गया। मेरे लिए सिर्फ पास होना ही पहली प्राथमिकता थी, फेल होने पर पढ़ाई जरुर छुड़ा दी जाती। यह डर, अज्ञानता, मूर्खता और सरकार की गलत नीतियों के कारण (दक्षिण भारत में हिन्दी विरोधी छात्र आन्दोलन – “हिन्दी, हिन्दू, हिन्दुस्तान” इस पर हम दे देंगे जान, आंदोलन सफल हो गया। सरकार ने 1969-1970 में इन्टर में अंग्रेजी स्वैच्छिक विषय कर दिया) सिर्फ पास होने की लालच में, मैं अंग्रेजी विषय छोड़कर बारहवीं में संस्कृत विषय लेकर इन्टर पास कर लिया।
10वीं में हमारे गांव के 9 विद्यार्थी थे। साइकिल से चलने और हॉस्टल में रहने वाले सभी फेल हो गए थे और मैं अकेला पैदल चलकर 59% मार्क प्राप्त कर पास हुआ था।
1971 में B.Sc. (PCM) हिन्दू डिग्री कॉलेज जमनियां में बिना सोचे समझे दाखिला ले लिया। इंग्लिश में लेक्चर दिमाग के ऊपर से गुजरने लगा। पूरी कोशिश के बाद भी छमाही टेस्ट में फिजिक्स और केमिस्ट्री में बहुत ही बुरा हाल था, पास होने का तो सवाल ही नहीं था और यह विषय पैदल चलकर नहीं पढ़ी जा सकती थी। मजबूरी में अपनी बड़ी बहन के यहां गांव दरौली जहां ट्रेन से आने-जाने का साधन था। वहीं रहकर पढ़ने लगा।
मुझे याद नहीं, पता नहीं क्यों और कैसे, मेरे अंदर एक जुनून था कि, किसी भी कीमत पर फेल नहीं होना है। इंग्लिश में लेक्चर कुछ भी समझ में नहीं आ रहा था। कुछ साथियों से विचार विमर्श के बाद पता चला कि कि, हिन्दी में भी साइंस की किताबें छपकर आ गई हैं। मैं वाराणसी जाकर हिन्दी में फिजिक्स और केमिस्ट्री की सभी किताबें खरीद लाया।
क्लास के लेक्चर से हमें कोई फायदा तो नहीं था, इसलिए कान में रुई डालकर, क्लास में सबसे पीछे बैठकर, शुरू के पाठ एक से खुद से पढ़ना शुरू किया। अब पढ़ाई और पास होने की जुनून के आगे कुछ भी नहीं दिखाई देता था। फाइनल इक्जाम के लिए मेरे पास समय बहुत कम था। पढ़ाई के लिए मेरे लिए एक एक मिनट भी बहुत ही महत्वपूर्ण था। मुझे वह समय व दिन याद है, परीक्षा से पहले और पूरी तैयारी के बाद, किताबों को पटक कर बोला था, साला कहीं से भी प्रश्न पूछेगा, हिन्दी में ही सही, जवाब तो लिख ही दूंगा।
1971, B.Sc. Part- 1, परिणाम आया, 70 परीक्षार्थी में से सिर्फ 7 लोग पास हुए थे, सिर्फ मैं अकेला, एक ही साल में पास होने वाला परीक्षार्थी था और सभी 6 लोग पिछले साल में फेल होने वाले रिपीटर पास हुए थे। पूरी पढ़ाई के समय मेरे साथ करीब-करीब 90% सर्वण विद्यार्थी पढ़ते थे।
सभी सर्वण प्राध्यापक पता नहीं कैसे यह पता लगा लिए थे कि, मैं यादव हूँ, जबकि मेरा नाम शिवशंकर सिंह ही रिकॉर्ड में दर्ज था। मुझे फिजिक्स और केमिस्ट्री प्रैक्टिकल में सिर्फ पासिंग मार्क दिए गए थे, जबकि हर एक प्रश्न का सही जवाब दिया था। वही जिन सर्वणों को 98% तक मार्क्स दिए गए थे, वे सभी फेल हो गए थे।
1972 में, B.Sc. (PCM) Final दो साल में पास होने वाला अकेला विद्यार्थी था। इसके बावजूद, फाइनल में भी प्रैक्टिकल मार्क्स में वही भेदभाव किया गया था।
*नौकरी के लिए ट्रेनिंग*
पढ़ने की प्रबल इच्छा होते हुए भी मजबूरी में, मुझे नौकरी ढूंढनी पड़ती थी। प्राइवेट हाई स्कूल में पढ़ाने के लिए जहां भी साक्षात्कार देने जाता, वहां 400 से 500 ₹ तक की रिश्वत मांगी जाती थी और मैं नहीं दे पाता था।
19 जनवरी 1973 में, पोस्ट ऑफिस में क्लर्क के लिए सीधे अप्लिकेशन देने पर,10वीं ग्रेड की मेरिट पर पोस्ट & टेलीग्राम विभाग मुम्बई में बिना इंटरव्यू के ट्रेनिंग के लिए सेलेक्शन हो गया।
1973 बैच में ही वायरलेस ऑपरेटर (P&T) की 12वीं ग्रेडिंग पर मेरिट से बिना इंटरव्यू के दूसरी नौकरी मिल गई।
1974 में, एक साल की ट्रेनिंग के लिए आर टी टी सी जबलपुर चला गया।
W.O. की ट्रेनिंग अभी समाप्ति हो ही रही थी कि, 1974 बैच की B.Sc. ग्रेडिंग पर, JTO ट्रेंनिंग के लिए, 1975 में उसी जबलपुर ट्रेनिंग सेंटर में, फिर एक साल के लिए ज्वाइन कर लिया था।
तीन साल में, योग्यता के अनुसार सरकारी नौकरी मेरिट पर, बिना इंटरव्यू के, एक के बाद दूसरी, फिर तीसरी पोस्टिंग सरकारी पोस्टल पेमेंट के साथ मिलती चली गई।
ट्रेनिंग लगातार होती गई, जिससे अंग्रेजी इम्प्रूव करने का मौका मुझे मिल गया था।
*सर्विस*
जूनियर टेलीकॉम ऑफिसर की ट्रेनिंग समाप्त होने के बाद 1976 में मेरी पहली पोस्टिंग टेलीफोन विभाग के जंक्शन प्लानिंग यूनिट में हो गई। वहां भी मैंने शानदार काम करके दिखाया था।
मुझे जब तीन साल के बाद, 1979 में, जूनियर टेलीकॉम ऑफिसर कैडर में, रोटेशनल ट्रांसफर रूलिंग के अनुसार प्लानिंग यूनिट से, कंस्ट्रक्शन यूनिट (मलाईदार यूनिट) में ट्रांसफर मिला। तब मेरे स्थान पर आने वाले साथी ने मुझे उस समय ₹10,000/- का ऑफर दिया और कहा कि आप ट्रांसफर के लिए मना कर दो। मैं असमंजस में पड़ गया और मैं कोई जवाब उस समय नहीं दे पाया। कंस्ट्रक्शन यूनिट या मलाई दार पोस्ट पर जाने की कोई मेरी जिज्ञासा भी नहीं थी। उसने वही पैसा किसी और को देकर मैनेज कर लिया और नियम के खिलाफ जाकर मेरा ट्रांसफर, ट्रांसमिशन रिपेयर सेंटर (T.R.C.) में करवा दिया और खुद कंस्ट्रक्शन यूनिट में ही बना रह गया। मैंने बिना विरोध किए स्वीकार कर लिया, क्योंकि मैं उस समय टेलीविजन रिपेयर करने के कारण, टेक्निकल एक्सपर्ट भी था। संयोग देखिए, वही अधिकारी मंडल अभियंता होने पर, 1999 में मेरे ही द्वारा, उसी यूनिट में, 60 करोड़ R.I. स्कीम में बुक हो गया, जो केस बाद में CBI को चली गई।
TRC में पहले से 8 स्टाफ मौजूद थे। रिपेयर के साथ-साथ PCM फॉल्ट कंट्रोल सेंटर भी वहीं से संचालित हो रहा था। रिपेयर का काम तो कोई नहीं कर रहा था। फील्ड से फॉल्टी कार्ड या यूनिट आना, उसे चेक करना और फिर विदेश रिपेयर के लिए भेज देना, क्योंकि सभी सिस्टम विदेशी हुआ करते थे। एक अधिकारी सिर्फ एक्सपोर्ट/इम्पोर्ट का ही काम देखता था।
एक सप्ताह तक सिस्टम का अध्ययन किया। 40 नंबर फॉल्टी कार्ड जापान भेजने की प्रक्रिया पूरी हो चुकी थी। उसी बॉक्स को मैंने ओपन किया, टेस्टिंग व रिपेयरिंग शुरू किया और उसमें से 10 कार्ड रिपेयर भी कर दिया। सभी तरह के फॉल्ट अब मैं रिपेयर करने लगा। विदेश रिपेयर के लिए फाल्टी युनिट या कार्ड भेजना बन्द हो गया। रिजल्ट अच्छा होने लगा। काम का आउटपुट भी बहुत ही सराहनीय था, टाप बास भी कभी कभी लंच टाइम में मेरे काम को देखने आते रहते थे। इसलिए सभी को ओवरटाइम बिना काम के भी मिल रहा था। मुझे कुछ अपराध-बोध जैसा महसूस हो रहा था। अपने बॉस को भी यह बात बताई, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ा।
एक बार अक्टूबर 1980 की सभी ने ओवरटाइम भत्ता (OT) साइन करके ले लिया और मैंने रिफ्यूज कर दिया। मैंने बॉस से कहा, न तो मैंने किसी दिन या किसी रविवार को OT किया है और न ही मैंने OT का कोई क्लेम भेजा है, तो OT का पैसा कैसे आ गया? किसने भेजा था और क्यों भेजा गया था?
अब क्या? हमारे बॉस SDE साहब की नींद हराम हो गई। हाथ-पैर जोड़ने लगे और कहने लगे कि आजतक मैं जिंदगी में ऐसा इंसान नहीं देखा। मेरी नौकरी चली जाएगी। मेरे लिए सिर्फ इस बार साइन कर दो। पैसा मत लो, किसी गरीब- दुखिया को बांट दूंगा। बड़े बास मंडल अभियंता भी समझाने की बहुत कोशिश किए, लेकिन उनकी ज्यादा हिम्मत नहीं पड़ी।
परिस्थिति की गंभीरता को देखते हुए, मैं अपने बॉस से कहा, मैं साइन तो नहीं करूंगा और इसके बाद मैं किसी भी तरह की लिखित या मौखिक किसी से शिकायत भी नहीं करूंगा। आप का दोष उतना नहीं है, जितना कि इस व्यवस्था का है। आपको किसी तरह की मुसीबत में नहीं आने दूंगा। आपको जैसे चाहिए, वैसे एडजस्ट कर लीजिए।
ओवर टाइम भत्ता बन्द होते ही धीरे-धीरे सभी स्टाफ ट्रांसफर लेकर चले गए। मैं अब अकेला एक मजदूर के साथ रिपेयर सेंटर, अपने SDE प्रमोशन 1990 तक बड़ी शान और मान मर्यादा के साथ, सुचारू रूप से चलाया।
कई बार ऐसा होता था कि वॉचमैन आता था और कहता था कि, साहब सभी लोग चले गए, ऑफिस बाहर से लॉक करना है, मैं फॉल्ट को वहीं अधूरा छोड़कर, दिमाग में वही सोचते हुए, ऑफिस बंद कर, जब कभी कभी घर पहुंचता था, तब बीवी की डांट पड़ती थी कि, आज भी टिफिन नहीं खाए। सोचते हुए अरे! आज भी खाने का ख्याल नहीं आया। मुंबई के अलावा पूरे देश से फाल्टी युनिट मेरे पास रिपेयर करने के लिए आने लगी थी। JTO कैडर में मुझे 1989 में भारत सरकार द्वारा *संचार श्री”* अवार्ड से सम्मानित किया गया था।
SDE का 1990 में प्रमोशन मिला। TRC की ही जिम्मेदारी दी गई। नियम के अनुसार काम करवाने के लिए कुछ स्टाफ भी दिए गए, लेकिन मैं काम पहले की ही तरह वैसे ही करता रहा। मेरी कोशिश के बाद भी, कोई रिपेयरिंग का काम सीखना भी नहीं चाहता था। जुलाई 1996 तक मैं अकेले दम पर वर्क शॉप संभाला।
*कभी न भूलने वाले कुछ यादगार पल*
1. *जनवरी 1980 की एक घटना* है, हम लोगों के ही अनुमोदन पर एक अच्छा सा वर्कशॉप बेंच बनाया गया। दूसरे साथी ने जिम्मेदारी निभाई। कुछ सरकारी पैसे बच गये होंगे, उसने ईमानदारी से हमारा भी शेयर रुपए 35/- दे दिया और मैं बिना सोचे-समझे ले लिया। ले तो लिया था, लेकिन दो तीन दिन तक उस पैसे को पचा नहीं पा रहा था। फिर उससे माफी मांगते हुए, एक दिन वापस लौटा दिया।
आज मैं महसूस कर रहा हूँ कि, यदि मैं रुपए 35/- उस समय पचा लिया होता तो, आज मैं, एक इमानदार सरकारी अधिकारी शूद्र शिवशंकर सिंह यादव नहीं बन पाता।
2. *एक बार प्रभादेवी (दादर) और अंधेरी के बीच का फिलिप्स माइक्रोवेव सिस्टम* प्रभादेवी के इक्विपमेंट में फॉल्ट आने से करीब बारह बजे के आसपास बंद हो गया। तीन बजे के आसपास मुझे गोरेगांव से आकर मदद करने को कहा गया। उस सिस्टम के बारे में मुझे कुछ भी टेक्निकल जानकारी नहीं थी। फिर भी सिस्टम का बुकलेट मंगाकर, थोड़ी जानकारी पहले ले लिया। मैं साढ़े छः बजे के आसपास वहां पहुंचा। DGM, GM के साथ सभी सिस्टम्स के एक्सपर्ट वहां मौजूद थे।
पहले मैंने पूरी टेस्टिंग मेथड की जानकारी ली। फॉल्ट कहां पर है, वह भी मालूम हो गया। किस यूनिट में फॉल्ट है, वह भी मैंने जानकारी कर ली, लेकिन फॉल्टी यूनिट को सही यूनिट से बदलने पर भी फॉल्ट नहीं ठीक होता था। टेस्टिंग से मालूम किया, एक पॉइंट पर सिग्नल है, लेकिन ठीक नेक्स्ट पॉइंट पर नहीं है, यही मेरे दिमाग को क्लिक किया। मैंने पीछे का कवर खोला, मेल-फीमेल ज्वाइन्ट को बारीकी से देखा, उसको थोड़ा सा पीछे से पुशकर, आगे की यूनिट को पुश कर दिया। सिस्टम मेरे पहुँचने पर, सिर्फ 10 मिनट में ठीक हो गया।
हुआ क्या था? एक बार यूनिट फॉल्टी हुई, रिप्लेस हुई, फिर भी नहीं आई। एक दो बार ज्यादा दबाव बनाने से, पीछे का फीमेल सॉकेट माइक्रो मिलीमीटर में थोड़ा पीछे को पुश हो गया था, इसलिए सही कॉन्टैक्ट नहीं हो पा रहा था। हर तरह से देखने में सही लग रहा था। (मैन मेड फॉल्ट)
3. *दिसंबर 1989 की घटना* हो सकती है। एक विदेशी कंपनी जिसका इलेक्ट्रॉनिक टेस्टिंग इंस्ट्रूमेंट खराब हो गया था और वह तुरंत किसी भी कीमत पर रिपेयर करवाना चाहता था। उसने MTNL Mumbai के चीफ बॉस को एप्रोच किया। बॉस ने मुझे बुलाया और उनकी सहायता करने का अनुरोध किया। सेन्चुरी बाजार, वर्ली , एक ऑफिस में सुविधाओं के साथ, उसी दिन शाम को रिपेयरिंग करने की योजना बनाई गई। अपनी आफिस प्रभादेवी से ड्यूटी के बाद, घर न जाकर, मैं वर्ली आफिस पहुँच गया। थोड़ा फ्रेश होकर, उन्हीं के एक टेक्निकल इंजीनियर से डायग्राम की सहायता से मशीन के काम करने की पूरी जानकारी ली। रात को तीन बजे उस इन्स्ट्रूमेन्ट को ठीक कर दिया। पता नहीं क्यों, उस काम से मुझे इतनी संतुष्टि और खुशी हुई थी कि, मैनेजर 1000/- रुपये बख्शीस करके ऑफर किया, फिर भी लेने का दिल नहीं किया।
4. *अक्टूबर 1989 की घटना* है। चार Faulty Line Tester (TEKELEC France) किसी से रिपेयर नहीं हो रहा था। NRC (ND), प्राइवेट कंपनी जैसे फोटोफोन्स लि., M/S Mekester आदि ने रिटर्न कर दिया था। चारों को फ्रांस भेजने का फैसला किया गया। मेरे पास लाकर कहा गया कि, इन चारों से फॉल्टी कार्ड पता लगाकर निकाल दीजिए, ताकि पूरा इंस्ट्रूमेंट न भेजना पड़े। मैं दो दिन में ही चारों रिपेयर कर दिया। पता नहीं कैसे? उसी दौरान फोटोफोन्स का इंजीनियर, जो उसे रिपेयर नहीं कर पाया था, वहां आ पहुँचा था और उसको इसकी जानकारी हो गई। वह मेरे बॉस से जाकर मिला। बॉस मेरे पास आए और बासिजम दिखाते हुए, आदेश दिया और कहा कि, बड़े बॉस यानी DE, DGM, यदि पूछें, तो कह देना अभी फॉल्ट नहीं मिला है। हां ठीक है, बोल तो दिया, लेकिन मैं बेचैन हो गया था। नींद तक नहीं आ रही थी। तीसरे दिन मेरे बड़े बॉस, जिन्होंने यह काम मुझे पर्सनली सौंपा था, मेरे पास आ गए। झूठ बोलने की हिम्मत नहीं हुई और मैंने सही बता दिया। शाबास बोलते!, पीठ थपथपाते!, बहुत खुश हो गए। अब मेरा बॉस मुझसे बहुत नाराज हो गया। इतना नाराज कि मेरा CR अच्छा नहीं लिखा। मुझे तब मालूम पड़ा, जब बड़े बॉस DE ने मुझे बुलाकर फिर से CR फॉर्म भरने को कहा और उनको फटकार लगाई, आप ऐसे अधिकारी का CR इस तरह लिखे हैं, जिसका नाम संचार दूत के लिए नामित किया जा रहा है। इस काम के लिए मुझे ₹2000/- पुरस्कार के साथ सम्मानित भी किया गया था।
*ऐसे बहुत से अविश्वसनीय काम पता नहीं कैसे? मैं कर रहा था? कोई कहता था “गॉड गिफ्ट” है, तो कोई चमत्कार समझता था।*
कई लोगों ने, मेरे इस ज्ञान से पैसे कमाने के कई तरह के प्रलोभन भी दिए, लेकिन मैं यही कहता था कि, जिस दिन इसका दुरुपयोग करूंगा, उसी दिन मैं असफल हो जाऊंगा। यह भी बताते चलूं कि, इसी अच्छे काम के साथ साथ 1982 से मैं बामसेफ में भी खुलकर बड़े पैमाने पर काम कर रहा था।
5. *विजिलेंस विभाग में पोस्टिंग कैसे हुई?*
1996 में प्रोटोकॉल नियम के अनुसार काम करवाने और किसी अन्य को ट्रेन करने के लिए एक JTO मेरे यहां पोस्ट किया गया। MTNL के किसी बड़े बॉस का वह रिश्तेदार था। अनुशासनहीन था, सीखना भी नहीं चाहता था। मुझे नहीं आता है, ऐसा कहते हुए कुछ करता भी नहीं था। समय पर आता भी नहीं था। उसके कारण अब मैं डिस्टर्ब होने लगा। बड़े बॉस DGM से उसे ट्रांसफर के लिए भी कहा था। समय पर सिर्फ आने के लिए प्यार से समझाने की बहुत कोशिश की, कोई फर्क नहीं पड़ता था। ज्यादा दूसरों में लापरवाही भी मुझे पसंद नहीं था। पहली अप्रैल 1996 से, 11 बजे के बाद उसको एब्सेंट करना शुरू किया। तीन दिन तक मस्टर पर “A” रिमार्क के बाद, बिना मेरी अनुमति के साइन कर दिया। अब क्या तीसरे दिन खुद उसके पास जाकर, जितना भी डांटना था, उतना उसे डांटा। गरीमत थी, सिर्फ हाथ नहीं उठाया था। डर तो गया, लेकिन समय पर आने में सुधार नहीं हुआ। अब A रिमार्क पर साइन नहीं करता था। अनियमित ड्यूटी पर आते हुए भी 15 दिन तक मस्टर पर एब्सेंट रहा। मंथली पेमेंट के लिए टाइम शीट भेजते समय, उस दिन उसे अपनी केबिन में बुलवाकर एब्सेंट के बारे में पूछा। घमंडी जवाब था, मैं कुछ नहीं जानता, बड़े बॉस के रिश्तेदार होने के नाते घमंड में, बोलते हुए उठ कर चला गया।
15 दिन का एब्सेंट लगाते हुए टाइम शीट भेज दिया। DGM से उसी दिन टेलीफोन पर पूरी बात बताने के बाद, उसे उसी दिन, ट्रांसफर व रिलीफ करते हुए, अपने बॉस DE के पास ही भेज दिया। इस विषय पर सवालों और जवाबों के बाद, मैंने 15 दिन का डाइज नॉन रेकमेंड कर फाइल भेज दिया। अब क्या? सभी घमंड ठंडा पड़ गया, हाथ-पैर जोड़ने लगा। मुझे संबोधित करते हुए माफीनामा लिखित पत्र भी दिया। मामला सेटल करने के लिए मेरे ऊपर काफी दबाव भी आने लगे। मैं अडिग तो अडिग! मैंने साफ शब्दों सभी बड़े बासो से कह दिया, अब मैं कुछ नहीं कर सकता हूँ।
GM (Vigilance) तक बात गई, उन्हें लगा, ऐसा अधिकारी तो Vigilance विभाग में होना चाहिए। पता नहीं इस केस को सेटल करने के लिए या विजिलेंस में अच्छा काम करने के लिए मेरा तबादला 18 जुलाई 1996 को विजिलेंस विभाग में हो गया। जो बाद में विभाग की सबसे बड़ी गलती साबित हुई। जिस महाप्रबंधक विजिलेंस ने अपने यहां मुझे पोस्टिंग करवाया था, उसके तबादले के बाद उसको भी अंधेरी टेलीफोन एक्सचेंज सरकारी आवास में बिजली चोरी के आरोप में बुक कर दिया था।
आप सभी साथियों को बता देना चाहता हूँ कि, यहां कोई करिश्मा नहीं था, सिर्फ मैंने ईमानदारी से, कर्तव्यनिष्ठा के साथ, संवैधानिक कानूनी अधिकारों का उपयोग करते हुए, निडरता से अपनी ड्यूटी निभाई थी ।
MTNL में काम करते समय अधिकारी के रूप में जहां भी पोस्टिंग हुई, वहीं नंबर एक पर, पता नहीं कैसे, पहचान होती चली गई।
7 साल में विजिलेंस विभाग में भी हड़कंप मचा दिया था। करीब 400 क्लास 2 & 1 भ्रष्ट अधिकारियों को बुक कर दिया। अकेले दम पर भ्रष्टाचार पर अंकुश लगाने में सफल हो गया। मुझे रोकने का कोई भी तरीका काम नहीं आ रहा था। वास्तव में मुझे ईमानदारी से काम करने की ताकत का अनुभव बहुत ही नजदीक से मिला है। लगता था सही में, यही ईश्वर का रूप है, जो मेरा हर समय, हर स्थिति में साथ देता था और सफलता मिलती चली गई।
ईमानदारी के कारण ITS अधिकारी को भी मेरे पैर पकड़कर रोते हुए देखा है। मेरे सामने अपने ही G.M. और DGM को डर से कांपते देखकर खुशी का जो अनुभव हुआ है, वह एहसास कभी पैसे से नहीं खरीदा जा सकता है।
यह मेरा अनुभव है, रिश्वत नकारने में पूरी जिंदगी भर, जो मन को सुकून और आनंद का अनुभव होता है, वह रिश्वत के क्षणिक सुख की बराबरी कभी नहीं कर सकता है।
ट्रांसफर कराने के लिए धरना, प्रदर्शन, घेराव मोर्चा, पार्लियामेंट तक क्वेश्चन आदि हथकंडे अपनाये गये। लेकिन श्री संजय कुमार जनरल मैनेजर विजिलेंस ईमानदारी से मेरे साथ खड़े थे। उनके प्रमोशन और ट्रांसफर के तुरंत बाद ही मेरा ट्रांसफर भी विजिलेंस से हो गया।
संजय कुमार ने मुझे उसी समय सुझाव दिया था कि, तुम भी बैंगलोर मेरे यहां ट्रांसफर लेकर आ जाओ। मुम्बई में तुम्हें सब परेशान करेंगे। मैंने उनके सुझाव को कायरतापूर्ण भागना समझा और उसे गंभीरता से नहीं लिया।
2002 में GM (south) के अधीन पोस्टिंग हुई। उन्हीं का मुझसे कहना था कि, कोई भी GM तुम्हें, अपने अधीन, तुम्हारी ईमानदारी और निडरता के कारण, लेने को तैयार नहीं था। मुझसे पूछा गया तो, मैं स्वेच्छा से तैयार हो गया। उनके अधीन रहकर मैंने अच्छा काम किया था।
*बदले की भावना*
2003 में डिविजनल इंजी. का प्रमोशन मिल गया। कार्य कुशलता और अनुभव के विपरीत, डमी पोस्ट पर पोस्टिंग मिल गई। अब जिनको करप्शन में बुक किया था उन्हीं अधिकारियों के अधीन काम करने की मजबूरी भी थी। किसी भी तरह के भ्रष्टाचार को टोकना और जहां तक होता था, रोकने की कोशिश भी करता था, सो बदला लेने की भी भ्रष्टाचारी अधिकारियों ने ठान लिया था ।
बिना उचित कारण मेमो लेटर हर दूसरे तीसरे दिन मिलना शुरू हो गया और मैं बिना झुके शांति से जवाब देता गया।
इसी बीच फरवरी 2006 में MTNL ND HQ से सतर्कता अधिकारी की स्वैच्छिक डिमांड निकाली गई। मैंने एप्लिकेशन सबमिट कर दिया। अब क्या? पूरे विभाग में हड़कंप मच गया। सभी यूनियन के लीडर और ITS lobby भी रोकने की कोशिश में लग गयी।
हमारे ही GM और DGM को यह जिम्मेदारी दी गई। मुझे मेमो तो पहले से दिया ही जा रहा था। बिना उचित कारण वार्निंग लेटर देते हुए “Not fit for Vigilance” रिमार्क एप्लिकेशन फॉर्म पर लिख दिया गया और इस तरह सतर्कता अधिकारी की एप्लिकेशन फॉरवर्ड नहीं की गई।
परेशान करने और मेमो देने का सिलसिला जारी रहा। 10-12 मेमो और उसके सही जवाब के बाद, एक बार, एक ही दिन में दो मेमो, एक सुबह और एक शाम को मिला। अब तो हद पार हो गई थी। GM, DGM को लगता था, कोई काम न उनके पास है और न मेरे पास है। मैं, एक दिन शाम को DGM की केबिन में घुसकर जो भी कहना था, तर्क पूर्वक जोर देकर कहा, आज के बाद तुम्हारे किसी भी मेमो का जवाब, अब मैं नहीं देने वाला हूँ, जो भी तुम्हें करना है, कर लो। उसके अंदर मैंने डर महसूस किया। क्योंकि वह भ्रष्ट अधिकारी था। उसकी हिम्मत मेरे खिलाफ मेमो देने की नहीं थी। वह तो GM का गुलाम बनकर उसकी सलाह पर काम कर रहा था।
इसके बाद उन दोनों के खिलाफ, सभी मेमो और उसके जवाब के साथ, उन दोनों के भ्रष्टाचार के काले कारनामों के प्रमाण और प्रूफ के साथ शिकायत पत्र, कार्यकारी निदेशक को प्रेषित कर दिया। अब क्या? हड़कंप मच गया। पूरे विभाग में चर्चा का विषय बन गया। मुझे CGM ने बुलाया, मान-सम्मान देते हुए मेरी तकलीफ के लिए खुद माफी भी मांगी और उचित कार्रवाई करने का आश्वासन दिया।
उन दोनों का ट्रांसफर कर दिया गया। मुझे वहां से हटाकर AGM (PRO) सहायक महा प्रबंधक (पब्लिक रिलेशन ऑफिसर) बना दिया गया। जहां पैसे का कोई लेन-देन नहीं और अफसरशाही भी नहीं के बराबर थी।
लेकिन जाते – जाते उन दोनों ने मेरा C.R. बहुत ही खराब लिख दिया था। जिसका मेरे प्रमोशन पर प्रभाव पड़ रहा था।
अब मैंने अपने कामों का प्रमाण, अवार्ड, पुरस्कार, मेडल आदि, देते हुए यहां तक बता दिया कि, जब मेरा C.R इतना खराब हो सकता है तो, विभाग का कोई भी अधिकारी योग्य और काम के लायक नहीं है।
CGM ने मेरा C.R. दुरुस्त किया और मुझे सूचित भी किया, इसके बावजूद भी I.T.S लॉबी प्रमोशन में रोड़ा अटका रही थी और पूछने पर जानकारी भी नहीं दे रही थी। मेरे भ्रष्टाचार की शिकायत पर दोनों अधिकारियों GM & DGM के खिलाफ कोई कार्रवाई भी नहीं हो रही थी।
अब बिना CGM से मिले, पूरे विवरण के साथ CENTRAL Vigilance Commission (CVC) को दोनों अधिकारियों के खिलाफ शिकायत पत्र भेज दिया। मुझे सूचित करते हुए शिकायत दर्ज हो गई। मान-सम्मान के साथ मेरी जीत हुई और 31 January 2011, सेवानिवृत्त होने तक, किसी में, मुझे टच करने की हिम्मत नहीं हुई।
सेवानिवृत्त होने के बाद, मैं RTI का काम शुरू किया। भ्रष्टाचार की जितनी भी विजिलेंस रिपोर्ट मैंने प्रस्तुत की थी, सबका रिपोर्ट मांगना शुरू किया। जो केस बड़े अधिकारियों के खिलाफ थी, उनके बारे में जवाब इस तरह था: फाइल नॉट अवेलेबल, too much old case, office shifted file misplaced आदि कई गलत जवाब मिला। 10-12 केस CIC तक गयी। साक्षात्कार के बाद, वहां से भी वही जवाब, एफिडेविट के साथ। CIC के अधिकारियों से पूछने पर जवाब था, हमारा काम जस्ट लाइक पोस्ट मैन की तरह है, जो सूचना मिलती है, गलत या सही, उसको आप तक पहुंचाना ही हमारी जिम्मेदारी है। इसके अलावा हमको कोई पावर नहीं है। यदि आप रिपोर्ट से संतुष्ट नहीं हैं, तो हाईकोर्ट में अपील कीजिये। फिर मैंने सोचा, हाईकोर्ट में इस उम्र में तारीख पर तारीख, कौन झेलेगा? RTI का काम करना बंद कर दिया। क्योंकि छोटी केसों की सही रिपोर्ट तो मिल जाया करती थी, लेकिन बढ़े बास की केसों में कोई विशेष फायदा नहीं होता था।
*महत्वपूर्ण यादगार पल तो बहुत हैं, लेकिन कुछ पल ऐसे हैं, जो जिंदगी में कभी भूल नहीं सकते।*
1. *दिसंबर 1998 की घटना* है। 60 करोड़ Reinstatement Scam (खुदाई के बाद रोड के गड्ढे को ओरिजिनल शेप में करना) बिना बराबर काम किए 1996-1998 तक का 60 करोड़ फ्रॉड बिल मेरे हाथ लग गया। सिर्फ 1997-98 पेड बिल वाउचर के आधार पर, 230 छोटे बड़े सभी अधिकारियों और 10 सिविल ठेकेदारों को दोषी करार करते हुए विजिलेंस रिपोर्ट लगा दिया।
केस दबाने के लिए पहले हर तरह से दबाव बनाया गया। लोग सफल नहीं हुए। एक दिन 50 लाख रुपए और एक फ्लैट की चाभी (ठाकुर कॉम्प्लेक्स कांदिवली 2 BHK) मेरा खास दोस्त ही, सुबह 10 बजे मेरे घर पर आ गया। मजबूरन उसको चार बजे जाना पड़ा।
इसी बीच CBI SU इस केस को अतिउत्साह दिखाते हुए खुद S.I.R दर्ज करते हुए अपने पास ले लिया। लेकिन बीच में आंध्र प्रदेश से पॉलिटिकल दबाव स्पीकर बालयोगी, फिर गृहमंत्री आडवाणी तक पहुँच गई। CBI केस वापस करने लगी। उस समय मैं CBI को जांच में सहयोग कर रहा था। अब मैं वहां के लिए हीरो से विलेन बन गया। जाँच ढीली हो गई। सभी मुख्य समाचार पत्र में रिपोर्टिंग भी हुई। मैं भी अपने सिद्धांतों के लिए अड़ गया। मुझे CBI से दूरी बनाए रखने के लिए धमकियां भी आने लगीं।
जनवरी 1999 में एक दिन सुबह 9 बजे के आसपास विदेशी टेलीफोन कॉल की घंटी बजी। जवाब में सामने से आवाज आई। साहब आप अपने ही साथियों को क्यों परेशान कर रहे हैं? पैसा भी लेकर क्यों नहीं समझौता कर लेते हैं? — उनकी बात बंद होने पर मेरा जवाब था:
“भाई साहब मैं पूरी जिंदगी में, एक सिर्फ ईमानदारी ही कमाकर विरासत रखा है। किसी भी कीमत पर इसको नहीं बेचने दूंगा। पैसा आप ही ले लीजिए और जहां तक मरने-मारने की बात है, 50 साल की उम्र हो गई है, कोई गोली मार देगा, समझ लूंगा हार्ट अटैक हो गया और मेरे बच्चे को नौकरी मिल जाएगी। मैं भी सिस्टम से तंग आ गया हूँ।”
सामने से, अब प्यार से आवाज आई – सिंह साहब! ये मेरा नंबर नोट करो और आज के बाद यदि आपको कोई तकलीफ दे तो मुझे याद कर लेना।
सचमुच उस दिन के बाद गलती से भी किसी से धमकी नहीं मिली और मैं ज्यादा निडर होकर और उत्साह से काम करने लगा।
बड़ी जद्दोजहद के बाद आला अफसर तथा कुछ टॉप के 11-12 ITS अधिकारियों को बचाते हुए कुल 11 नंबर FIR 2000-2001 में दर्ज की गई।
मैंने CBI Director के खिलाफ शिकायत पत्र राष्ट्रपति, CVC, Chief Justice Bombay High Court आदि को प्रेषित किया। सिर्फ आश्वासन के अलावा कोई कार्रवाई नहीं हुई।
आगे बताने की जरूरत नहीं है कि यदि सभी लोग बचाना ही चाहेंगे तो केस का क्या होगा? बताने की जरूरत नहीं है, CBI की असलियत आज सबके सामने है।
2. *अक्टूबर 1999 में* एक दिन शाम चक्रा होटल साकीनाका में खुशी में पार्टी रखी गई, मुझे भी बुलाया गया। पीने के बाद खुशियां मनाते हुए कुछ लोगों ने मुझसे कहा कि “हम लोगों की जीत हो गई, तुम्हारी CBI की मेन फाइल CBI Director ने बिना साइन किए वापस लौटा दिया है।” दूसरे दिन मैंने यह बात श्री प्रदीप कुमार Dy SP CBI को बताया। उन्हें यकीन नहीं हुआ और यह कहते हुए कि नशे में कोई कुछ भी बोलता है, बात को टाल दिया। लेकिन सही में तीसरे दिन फाइल बिना साइन हुए, चार महीने बाद वापस आ गई। प्रदीप कुमार हाथ जोड़कर नतमस्तक होकर बोले, श्रीमान जी, आप जैसी खुफिया गिरि मैंने आज तक नहीं देखी।
यह बात हम दोनों ने SP को नहीं बताई, उन्होंने सोचा गलती से बिना साइन के फाइल वापस आ गई है, दूसरे दिन फाइल लेकर दिल्ली CBI Director के पास साइन कराने पहुँच गए, फाइल छोड़कर आ गए। तनाव में थे, मुझे केबिन में बुलाए और कहा कि, 4 केस दर्ज हुई हैं वह भी MTNL को वापस जाएगी। आगे की बची हुई केस हम नहीं करेंगे। हमारी भी उनसे काफी तीखी बहस हो गई। एक हफ्ते के भीतर उनका तबादला हो गया और प्रदीप कुमार Dy SP. ने मुझसे माफी मांगते हुए कहा “सर आपका काम, मैं आपके इच्छानुसार नहीं कर सका और ईमानदारी से काम करने के बाद, इतने दुखी हुए कि सर्विस से रिजाइन ही कर दिया।” मैं भी अब हताश हो गया। नए SP आए उनके सामने अपनी बात रखी, लेकिन बात नहीं बनी। लेकिन कहते हैं कि ईमानदारी में बहुत ताकत होती है। एक नाटकीय घटनाक्रम रिकार्ड और मेरे पास में आ गया (लिख नहीं सकता) CBI में भूचाल आ गया और फिर सभी केस मजबूरी में CBI (ACB) द्वारा दर्ज करनी पड़ी।
“यह देश का दुर्भाग्य है कि CBI Director दिन में फाइल पर क्या नोटिंग लिखता है, ठीक उसी दिन शाम को बियर बार में आम नागरिक को मालूम पड़ जाता है।”
3. *18 जून 2002 को* सतर्कता विभाग के खिलाफ ऑफिसर्स एसोसिएशन ने बहुत बड़े पैमाने पर, मुख्य कार्यालय प्रभादेवी पर मोर्चा निकाला। मैंने ऑफिस में लोगों से कहा था, विजिलेंस के खिलाफ मोर्चा मतलब, यह हम सभी की जीत है। मैंने उस दिन उसी बिल्डिंग में 15वें फ्लोर पर सतर्कता विभाग में मिठाइयाँ बांटी थी। कुछ लोगों ने कमेंट किया, जले पर नमक छिड़क रहे हो। मोर्चे में एस आर सिंह (सनकी) संबोधन किया जा रहा था। मीडिया वाले, आज-तक और ETV वाले भी मुझे ढूंढने लगे। कानूनी नियम के अनुसार, मुझे इनसे बचना था। मैंने कहा भी था कि, मैं टेलिविजन पर इन्टरव्यू देने के लिए एथोराइज्ड पर्सन नहीं हूँ, फिर भी लोगों ने घर तक पीछा किया। अंत में GM (V) की सलाह पर ऑफिस में 20 जून को आज-तक और ईटीवी टेलीविजन वालों को इन्टरव्यू दिया।
*कुछ यादगार वक्तव्य*
1. सतर्कता अधिकारियों की मीटिंग में एक बार संजय कुमार (महा प्रबंधक सतर्कता) का कहना –
_S. R. Singh has proved that, everyone can not be purchased._
2. एक बार ऐसी ही दूसरी मीटिंग में –
यदि कानून अलाउ करता और यदि मेरा बस चलता तो, मैं एस आर सिंह को महाप्रबंधक बना देता।
3. एक बार मैं भी अतिउत्तेजना में ऐसी ही एक मीटिंग में, भारत सरकार के वाहन के दुरुपयोग पर कोशिशों के बावजूद, भ्रष्टाचार पर लगाम न लगने पर, चर्चा के दौरान कह दिया था –
यदि किसी अधिकारी के बीवी-बच्चे सरकारी वाहन में सफर करते दिखाई दिए तो, मैं उसमें पेट्रोल डालकर फूंक दूंगा, फिर देखूंगा क्यों और कैसे कम्प्लेन करते हैं। एकदम सन्नाटा पसर गया था।
4. 60 करोड़ रुपए के स्कैम की Times Of India में रिपोर्टिंग होने के बाद, श्रीमती-स्मिता दशमुख (Chief Editor B.T.) मिलने की उनकी चाहत और मुलाकात होते ही आश्चर्य से, _”I am surprised, that how you are alive?”_
*संछेप में निष्कर्ष -*
मैं अपने अनुभव से दावा कर सकता हूँ कि यदि IAS, IPS, ITS, IFS आदि, जिनकी भ्रष्टाचार रोकने की जिम्मेदारी सौंपी गई है, यदि यही कैडर, थोड़ा ईमानदार और निडर हो जाए, संविधान और कानून का सही पालन करने लगे तो इस देश को विकसित होने में देर नहीं लगेगी।
*पत्रकार और मीडिया की बात करना भी यहां थोड़ा उचित होगा*
एक दिन हमारे ऑफिस में एक मराठी पत्रकार अचानक बड़ी सहजता से पूछा, “क्या आप यादव हैं?” मैंने कहा हाँ, क्यों, क्या बात है?
“कुछ नहीं, जनसत्ता का पत्रकार दीक्षित बोल रहा था, वह यादव है।”
हमारे काम की पचासों रिपोर्टिंग _Times of India, महाराष्ट्र टाइम्स, Indian Express, लोकसत्ता, मराठी सामना_ आदि में हुई, लेकिन वही हिन्दी के _नवभारत टाइम्स, जनसत्ता_ आदि किसी भी पेपर में, कहीं भी, किसी भी तरह की कोई रिपोर्टिंग नहीं दिखाई देती थी। मुझसे मिलने पर कहते थे, “आप उत्तर भारतीयों की शान हैं,” लेकिन समाचार पत्रों में रिपोर्टिंग के नाम पर ऐसे नाक-भौं सिकोड़ते थे, जैसे ‘अहीर’ के नाम से बदबू आती हो।
अब आप लोग ही बताइए कि कोई मनुवादी, यदि जाति से अहीर या यादव जानकर मुझे अपने से नीचा समझता है, तो हमें या आपको कैसा महसूस होगा? धन्यवाद!