जब धोबिन पर प्यार उमड़ पड़ा – शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

भूली – बिसरी यादें, जब धोबिन पर प्यार उमड़ पड़ा

एक बार बचपन में, (1956-58 का हो सकता है) शाम के समय जब धोबिन धोए हुए साफ कपड़ों को लेकर हमारे घर पर आई और हमारी माँ कपड़े उसके सामने बैठ कर ले रही थी और गंदे कपड़े धोने के लिए दे रही थी। हो सकता है, उसी समय मैं बाहर से खेलते-कूदते घर में प्रवेश किया होगा। बचपना की वजह से मैं उस कपड़े से ही खेलने लगा। माँ ने जोर से हाथ पकड़कर मुझे अपने पीछे कर दिया। तभी मेरे नटखट व्यवहार को देखकर धोबिन हंसने लगी। पता नहीं मुझे उस समय क्या सूझी? मां कपड़े गिनने में व्यस्त थी, तभी उसकी नजरों से बचकर, मैं बैठी हुई धोबिन के पीछे जाकर उसकी पीठ पर गले से लिपटते हुए झूल गया।

   अब क्या! धोबिन गले से हाथ छुड़ाते हुए, मुझे अपने से दूर हटाने की कोशिश करने लगी। यह देखकर माँ भी आई और एक हल्का सा थप्पड़ लगाते हुए उससे दूर रहने के लिए कड़ी फटकार भी लगाई। फिर मेरे कपड़े उतार कर मुझे नंगा स्नान कराया, मतलब मुझे शुद्ध किया गया था।

( उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल में उस समयकाल में धोबी अछूत जाति मानी जाती थी)

   पता नहीं मेरी उम्र क्या रही होगी, यह तो मनोवैज्ञानिक चिकित्सक ही बता सकता है। लेकिन इतना जरूर है कि उस घटना से मेरे दिमाग में एक सदमा जरूर लगा है। आज भी दिमाग के पटल पर वह सीन कभी भूलता नहीं है। और कुछ भी याद नहीं है, कब और कैसे घर में घुसा था, यह भी याद नहीं है। सिर्फ धोबिन का हंसता हुआ चेहरा, उसकी पीठ पर झूलना, उसका मुझे हटाना, माँ का डांटना, हल्के से मारते हुए आगे से नादानी न करने की हिदायत देना तथा खुले में नंगा स्नान करवाना याद है।

    सामाजिक व्यवहार में जब कभी छुआछूत का जिक्र आता है तो, यह सीन मेरे दिमाग के पटल पर आ ही जाता है। मुझे लगता है यह भी एक फैक्टर है जो कभी-कभी मेरे दिमाग को विचलित करता रहता है। इसी से संबंधित एक घटना का जिक्र करना उचित समझता हूं।

   1975 की बात है, मैं मुम्बई में नौकरी कर रहा था। हमारे तीसरे, सबसे छोटे भाई की शादी थी। बारात निकलने के दिन दोपहर को भोज-भात की व्यवस्था थी। सभी बारातियों, सगे- सम्बन्धियों को परिवार के द्वारा भोजन करा दिया गया था।

   अब बैंड-बाजा बजाने वाले, हमारे ही गांव के चमार जाति के 10-12 लोग खाना खाने के लिए आए। पता नहीं उस समय मुझे क्या सूझी? इनको खाना खिलाने के लिए मैं स्पेशली आगे आया। मैंने उन लोगों से अपील की कि, मैं एक ही शर्त पर खाना खिलाऊँगा। आप लोग इज्जत से दूसरे मेहमानों की तरह खाना खाओगे तभी मैं खिलाऊँगा, अन्यथा खाना लेकर जाओ और घर पर खा लेना। आगे शर्त रखा कि, आप लोगों का भी झूठा पत्तल मैं ही फेंकूंगा। अरे बाबू साहब, ऐसा कैसे होगा? फिर भी आग्रह करके खाना खिलाया। लाख मना करने पर भी 6 बुजुर्ग लोग नहीं माने, धर्म की रक्षा के लिए पत्तल उठा कर ले ही गए। बाकी बचे पत्तलों को मैंने उठाया और थोड़ी दूरी पर लेजाकर फेंक दिया।

  अब गाँव के ही मुशहर, डोली ढोने वाले 10-12 परिवार बच्चों के साथ भोज खाने आए। उनके सामने भी यही प्रस्ताव रखा। सिर्फ चार-पाँच बच्चों ने पत्तल छोड़ा, मना करने पर भी बाकी सभी लोग पत्तलों को उठाकर ले गए।

   यह मेरा व्यवहार घर-परिवार और गाँव वालों को नागवार गुजर रहा था, आपस में फुसफुसाहट चालू थी, लेकिन मुझे उस समय कोई बोल नहीं रहा था।

   हमारे ही बिरादरी के सत्यनारायण बड़े भाई साहब, जिनके तीन छोटे भाई, दो पुलिस में और एक रेलवे में नौकरी पर थे। उनमें थोड़ा घमंड होना स्वाभाविक था। बारात जाने का समय था, बहुत लोग इकट्ठा भी हो गए थे। भाई साहब हमें हिन्दू धर्म और परम्परा को लेकर उल्टा-सीधा बोलना शुरू किए। परम्परागत सामाजिक गलती करने के कारण शुरू में तो, मैं चुप रहना ही अपनी भलाई समझ रहा था, लेकिन जब उन्होंने पढ़े-लिखे लोगों पर ही कटाक्ष करना शुरू किए तो मैं भी अपने आप को नहीं रोक पाया।

   अब सीधा सवाल किया: “ए सत्यनारायण भैया! आपके शरीर पर जब आप का बच्चा मूत्र और टट्टी कर देता है तो कौन साफ करता है? खुद की आपकी शौच की गंदगी को कौन धोता है? शर्म नहीं आती है! क्या यह झूठा पत्तल उससे भी गंदा है, जो आप हमें मूर्ख कहते हो? अरे मूर्खो! यदि किसी को खाना खिलाते हो तो, उसे थोड़ा सम्मान और इज्जत से खिलाओ, अन्यथा मत खिलाओ। इज्जत से खिलाने में तुम्हारा क्या नुकसान हो जाता है?” अब क्या, सबकी बोलती बंद हो गई।

  साथियों, आज भी जब किसी नेता या मंत्री को किसी हिन्दू धर्म के पाखंडी के घर पर ऊंच-नीच और छुआछूत की भावना से अलग से प्लास्टिक की गिलास में पानी या चाय तथा पत्तल पर खाना खाते समय सोसल मीडिया पर देखता हूं तो मन बहुत व्यथित हो जाता है।

– शूद्र शिवशंकर सिंह यादव

संक्षिप्त जीवन परिचय

गांव – अदसड़, जिला-चन्दौली, उत्तर प्रदेश, तीन जिला – गाजीपुर और कैमूर (बिहार) बॉर्डर पर स्थित है। शहर से काफी दूर, नक्सलवाद प्रभावित, सर्वण बहुल गांव के शिक्षा विहीन परिवार में पैदा हुआ ।

पिता जी , राजकमल सिंह, माता जी, पुर्णवासी देवी, दो छोटे चाचा- रामटहल और शिवटहल, संयुक्त परिवार। हम सभी 9 भाई और 3 बहनें, मेरे अलावा कोई भी पढ़ाई कर सर्विस में बाहर नहीं निकल पाया। खेती गृहस्थी और पशुपालन में ही लगे रह गए।

प्रारम्भिक शिक्षा

गांव के ज्यादातर पेड़ की छांव में प्राथमिक सरकारी स्कूल से, पांचवीं बोर्ड परीक्षा प्रथम स्थान से पास किया। 3 किलोमीटर दूर स्थित मिडिल स्कूल अरंगी, उस समय के वाराणसी जिला में 25वां स्थान हासिल कर 1966 में 8वीं बोर्ड परीक्षा पास किया था।

1968 में 8 किलोमीटर दूर पैदल चलकर, हिन्दू इन्टर कॉलेज जमानियां गाजीपुर से हाईस्कूल, 1970 में 12वीं और फिर वहीं से 1972 में हिन्दू डिग्री कॉलेज जमनिया से B.Sc. पास किया। संपूर्ण जीवन परिचय अन्य बलाॅग में दी है।

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