राजनीति कैसे सड़ा तालाब बन जाती है – निखिल सबलानिया

जिन दिनों जेएनयू का प्रकरण चल रहा था और कन्हैया कुमार को मीडिया द्वारा हीरो बनाया जा रहा था तब मैंने अपने मामा जी से इस बारे में बात करी। मामा जी ने कहा बेटा वह बैठकर पढ़ रहा है और फ्री में हीरो बन रहा है। जबकि तू, इतना काबिल होकर और एक अच्छे प्रोफेशन को छोड़कर समाज को बदलने के लिए किताबें बेचकर अपना जीवन यापन भी कर रहा है और जिंदगी का बोझ भी उठा रहा है और समाज को भी जाग रहा है। तो यह है असली काम। मामा जी की बात आदर्शवादी तो थी, पर समस्या यह है कि समाज और राजनीति से जुड़े लोग इस बात को नहीं समझते। दुनिया दिखावा बनती जा रही है। हालांकि मैं उनकी बात से न केवल सहमत हूं बल्कि मैं खुश हूं कि मैंने जो किया और मुझे इस पर कोई गिला शिकवा नहीं है। पर मुझे हमेशा यह लगता है कि एक काबिल इंसान को और खास करके ज्यादा काबिल इंसान को एक तरफ कर दिया जाता है। और इससे असल में जो बदलाव उस क्षेत्र में होने चाहिए वह नहीं हो पाते। इससे वह क्षेत्र नवीनीकरण से पीछे छूट जाता है और केवल लोगों की कमाई का जरिया बन जाता है। यह लोग न केवल उस क्षेत्र पर कब्जा जमा लेते हैं, बल्कि एक काबिल व्यक्ति को उस क्षेत्र में घुसने से ऐसे रोकते हैं जैसे कई कुत्ते मिलकर एक भेड़िए को शिकार करने से रोकने के लिए भौंकते हो। आपने कुत्तों का नेटवर्क तो देखा है। हर गली, हर चौराहे पर कुत्तों का एक नेटवर्क होता है। यह कुत्ते एक दूसरे के क्षेत्र में प्रवेश तो नहीं करते, पर किसी अन्य के प्रवेश करने पर, या किसी अन्य के सामने डरकर भौक भौंक कर दूसरे क्षेत्र के कुत्तों को बुला लेते हैं। और फिर दूसरे क्षेत्र के कुत्ते, जो वैसे तो उनके क्षेत्र में नहीं आते थे, पर अब जाकर इनको बचाते हैं। जैसे कुत्तों का नेटवर्क अपने स्वार्थ को बचता है, ऐसे ही इंसान किसी क्षेत्र और खास करके राजनीति में अपने स्वार्थ को बचाने के लिए विरोधियों के साथ भी मिलकर अपना नेटवर्क कायम रखते हैं। ऐसे भी सभी क्षेत्र होते हैं और चाहे वह राजनीति का क्षेत्र हो। इससे वह क्षेत्र एक गंदे तालाब के समान हो जाता है और सड़ने लगता है। यही हाल राजनीति का होता है। राजनीति में कुछ नवीन विचारों को ले लिया जाता है, जैसे की मार्क्स या डॉक्टर अंबेडकर जी को ले लिया गया। पर बाद में ठीया सैट होने के बाद उन्हीं विचारों को बार-बार दोहराया जाता है। पर असल में यह बिना आत्मा के मृत शरीर के समान होता है। यानी कि, राजनीति में केवल दिखावटीपन रह जाता है पर उसके विचार भाव समाप्त हो जाते हैं। और मेरे लिए यही चिंता का विषय है। यही कि अपने स्वार्थ के लिए इतना डरपोक बन जाना कि बदलाव लाने वाले व्यक्ति को रोक दो। पर साथ ही ऐसी कठपुतलियों को खड़ा कर दिया जाता है जो बदलाव का दिखावा करते हैं लेकिन असल में उनकी डोर इन नेटवर्क के आका के पास ही होती है। यह राजनीति है, केवल संसद की नहीं, बल्कि, जीवन के हर क्षेत्र की। जो हमें समझनी चाहिए और हमें इसलिए भी समझनी चाहिए ताकि हम अभिमन्यु की तरह इस चक्रव्यूह को न केवल भेद सकें, बल्कि हताश न हो और अपने में कमी न ढूंढे कि हम ही गलत हैं। – निखिल सबलानिया

निखिल सबलानिया

निखिल सबलानिया द्वारा लिखित, अनुवादित और प्रकाशित पुस्तकें यहां से प्राप्त करें

https://www.nspmart.com/product/8booksnsp/

आभार

फेसबुक https://www.facebook.com/share/1Hyd99hjz6/

एक्स https://x.com/nikhil_sablania

 

यूट्यूब https://youtube.com/@velesviews?si=tmjDs_t0nT6IZyB9

 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

Loading...
0Shares