मायावती जी पर यह आरोप लगाना कि वह ए. सी. में रहती हैं, सड़क पर नहीं आती, अत्याधिक धन है और बीजेपी के साथ हैं, तो यह राजनैतिक स्वार्थ, पागलों के शोरगुल और बेवकूफों की नासयझी से ज्यादा और कुछ नहीं है। पर फिर भी इन सभी बातों के जवाब नीचे दिए हैं।
1. एयर कंडिशनर (ए. सी.) का मामला – ए. सी. तो जरूरत है जैसे फ्रीज हर घर में है। मायावती जी ने पचास साल बाबासाहेब जी के मिशन में दिए और यूपी में चार बार बहुजनों की सरकार बनी। क्या किसी अन्य राज्य में किसी ऐसी पार्टी ने ऐसा किया जिस पर दलितों की पार्टी होने का तगमा लगा हो? बीएसपी का मिशन देश के सभी वंचित लोगों को न्याय दिलाना है और कोई दो चार विधायक या दस बीस सांसद बनाना नहीं। पार्टी ने कई राज्यों में कार्यालय खड़े किए हैं, हजारों विधायक और लाखों काउंसलर और पंचायत के चुनाव देखने होते हैं। इनकी प्लानिंग और चर्चा कमरों में ही होती है, रोड़ पर नहीं। दुनिया की बड़ी से बड़ी डील टेबल पर होती है। आप जैसे ही कई लोगो फिर कहते हैं कि प्रधानमंत्री सिर्फ घूमते हैं पर ऑफिस में बैठ कर काम नहीं करते । आप पार्टी से जुड़ें और देखें कि पार्टी के कितने नेता लोगों के पास जा रहे हैं। हमारी पार्टी लोगों को अधिकार दिलाना चाहती है, बलि का बकरा नहीं बनाना चाहती। और साथ ही पार्टी कोई मदारी का बंदर नहीं है कि किसी के भी इशारे पर किसी भी प्रदर्शन में नाचे। पार्टी जानती है कि राजनीति कौन और कैसे करता है। जहां तक शिक्षा की बात है तो हमारी पार्टी ने सरकारी काॅलेज और विश्वविध्यालय बनवाए, जबकि आज जो विपक्ष नौटंकी कर रहा है, उसने तो हमेशा शिक्षा का निजीकरण किया। हमारे काल में निम्न तबकों के बच्चे न केवल डॉक्टर ही बने बल्कि उन्होंने अस्पताल भी खोले। बेटियों को स्कूल जाने के लिए साइकिलें सबसे पहले हमने भेंट की ताकि बच्चियां शिक्षा आसानी से ले सके। हमारे पास दूर की नीतियां हैं और हमारे नेता जमीनी स्तर पर सक्रीय हैं। आप हमारी पार्टी से जुड़िए और पार्टी के लिए काम करिए। मायावती जी आज हैं कल नहीं होंगी, पर पार्टी ही जरूरी है क्योंकि आप संगठन को मजबूत करोगे तो संगठन आपको मजबूत करेगा।
2. बीएसपी को सीटों का लालच नहीं है। चालीस सालों से जो हमारी पार्टी बाबासाहेब जी के मिशन पर चल रही है तो क्या हम एक दो सीट के लालची हैं? आज हम उनसे राजनीति सीखेंगे जो हमारे सामने पैदा भी नहीं हुए और हमारे पोते पोतियो के समान हैं? अगर हमारी पार्टी और उससे पहले कांशीराम जी साठ सालों से बाबा साहेब जी के मिशन को आगे नहीं बढ़ा रहे होते तो कौन सा युवा आज हाथ में बाबा साहेब जी की फोटो लेकर खड़ा हो पाता और चुनाव जीत पाता? आज आप लोगों को शून्य से राजनीति की शुरुआत करनी पड़ती। अगर हम लोगों ने संघर्ष नहीं किया होता और हमारी पार्टी नहीं होती तो आप किसको बुरा बोलते हैं? असल में आप आज की वह पीढ़ी हो जिनको बस हरे बाग देखते हैं लेकिन संघर्ष नहीं करना। पार्टी ने चार बार सरकार बनाई, पूरे देश में कार्यालय खड़े किए, लाखों लोगों का संगठन और हजारों नेता बनाएं, यह क्या काम है? आज विपक्षी दलों में इतने जो नेता और मंत्री बनकर बैठे हैं उनको भी हमारी पार्टी, बीएसपी ने ही तब मौका दिया जब उनके समाज के लोगों को कोई और पार्टी पूछती भी नहीं थी। लोग क्या स्वार्थी नहीं होते? लोग क्या पार्टी को धोखा नहीं देते? क्या विपक्षी पार्टियां धोखे से बीएसपी को पीछे नहीं करती? क्या ई वी एम मुद्दा खत्म हो गया? असल में तो आप एक डरपोक हो जिसमें लड़ने का दम नहीं है और अगर लड़ने का दाम है तो आप बीएसपी के साथ आकर खड़े होते हैं ना कि बीएसपी की आलोचना करते। राजनीतिक एक युद्ध के शतरंज की बिसात है जिसमें कई बार चार कदम आगे होते हैं तो दस कदम पीछे भी करने पड़ते हैं। लेकिन इसका मतलब यह नहीं होता कि जिस दल के लिए आप लड़ रहे हो उसको छोड़कर उस दूसरे दल में भाग जाओ जो आपका शत्रु है और अपने ही दिल की आलोचना करने लग जाओ।
3. क्या सिर्फ बीएसपी के पास ही धन है? आपके पास अन्य दलों को आने वाले धन की जानकारी है और आप जानते हैं कि चुनाव में कितना खर्चा होता है और आप जानते हैं कि नेताओं पर कितने केस एक के बाद एक किए जाते हैं जिन्हें लड़ने के लिए महंगे वकील करने पड़ते हैं और आप जानते हैं कि नेताओं की जान को कितना खतरा होता है और उस खतरे को रोकने के लिए पुलिस से लेकर प्राइवेट एजेंसियों तक को कितना पैसा देना पड़ता है? और आप यह बताइए कि ऐसे कितने दलित इस देश में जो अमीर होंगे? आप इस देश के किसी भी पाॅश एरिया में जाइए और वहां पर खोजें कि कितने दलितों की कोठियां हैं और कितने उच्च वर्ग के हिंदुओं की। ऐसे इल्जाम लगाने से कोई फायदा नहीं है जब तक कि आप सच्चाई का सामना ना करें। धन जरूरी है पर यदि हमारी पार्टी के पास धन है तो वह कोई पूंजीपतियों का धन नहीं है। हमारी पार्टी के पास हमारे नेताओं का और हमारे अनुयायियों का धन है और बाकी पार्टियां बड़े पूंजीपतियों के धन से चलती हैं और वे पार्टियां काम भी पूंजीपतियों के लिए करती हैं। पर हमने आम जन के लिए काम किया है और हम आगे भी आम जन के लिए काम करेंगे। पर काम हवा में नहीं होते। जिन पार्टियों को आप मीडिया में देखते हैं वह अरबों-खराबों रुपया मीडिया में डालकर आप तक पहुंचती है। लेकिन आप बताइए आपने आज तक कितना पार्टी को दिया है आगे बढ़ाने के लिए। कोई आपके पास पर्ची है आपके दिए दान की?
4. क्या बीजेपी के साथ चंद दिनों की साझेदारी से आज भी साथ देने के आरोप लगाएं जाएंगे? अटल बिहारी वाजपेयी जी और मायावती जी की जो फोटो है क्योंकि यह फोटो सार्वजनिक है लेकिन कितनी मुलाकात है बीजेपी के नेताओं की कांग्रेस से समाजवादी पार्टी के नेताओं से होती है पर उनकी तस्वीर सामने नहीं आती। लेकिन आप सिर्फ फोटो से लोगों को गुमराह नहीं कर सकते। जिस समय की यह फोटो है उसे समय यह दोनों पार्टियां ही राजनीति में पैर जमाने के लिए संघर्ष कर रही थी। जहां बीएसपी वंचित सबको की बात कर रही थी, वही बीजेपी कांग्रेस विरोध की बात कर रही थी। दोनों के लक्ष्य समान थे कि सामंतवादी कांग्रेस पार्टी को हटाना। पर ऐसी फोटो से आपको यह जानकारी नहीं मिलती, कि जहां बीजेपी अपने मूल विचार से हटकर धार्मिक उन्माद के द्वारा सत्ता पाने के रास्ते पर चली गई, वहीं बहुजन समाज पार्टी अपने उसूल पर टिकी रही। बहुजन समाज पार्टी ने कभी भी धर्म को सत्ता पाने की तलवार नहीं बनाया। बहुजन समाज पार्टी ने कभी भी बड़े पूंजीपतियों से धन की उगाही करके सरकारें नहीं बनाई। और बहुजन समाज पार्टी ने निजीकरण ना करके सरकारी सेक्टर को बढ़ावा दिया। इसलिए बेशक बीएसपी ने एक समय बीजेपी से सत्ता में साझेदारी करने के लिए कुछ समय के लिए हाथ मिलाया था, लेकिन जब बीएसपी को लगा कि भाजपा अपने उसूलों पर नहीं चल रही तो तुरंत अपना हाथ पीछे खींच लिया था। इसलिए अटल बिहारी वाजपेई और मायावती जी के साथ की पुरानी फोटो डालकर कोई फायदा नहीं है। इससे आप भी उन धोखेबाजों का साथ दे रहे हो जिनकी वजह से बहुजन समाज तो कमजोर हुआ है और अन्य सर्वजन का भी बुरा हाल आज हो रहा है। अगर मायावती जी बीजेपी के करीब होती तो सबसे पहले उन गद्दार नेताओं को बीजेपी से बाहर निकलवाती जो बीएसपी को धोखा देकर गए हैं। पर क्या, बीजेपी कांग्रेस की एजेंट नहीं लगती आपको? केरल के पूर्व मुख्यमंत्री ने कहा कि राहुल गांधी ने केरल में आरएसएस को घुसा दिया, अखबार पत्रों में लिखा गया कि विजय को राहुल गांधी ने समर्थन दिया, लेकिन विजय ने इंडिया गठबंधन को समर्थन नहीं दिया और इससे भाजपा मजबूत हुई, हाल ही में महाराष्ट्र के एक निकाय चुनाव में कांग्रेस और बीजेपी ने मिलकर चुनाव लड़ा, आरएसएस का कांग्रेस को पता था कि आरएसएस क्या है पर फिर भी कांग्रेस ने कभी आरएसएस को बैन नहीं किया, बल्कि और बढ़ाया। अगर आप आंखे खोलेंगे तो आपको कांग्रेस और बीजेपी की आपसी सैटिंग के हजारों कैसे मिल जाएंगे। इस प्रकार हमारी पार्टी के ऊपर आरोप लगाने से पहले जाकर अपना रिसर्च पूरा करिए। एक तरफ तो आपके जैसे लोग कहते हैं कि ईवीएम से बीजेपी जीत जाती है और दूसरी तरफ आप भूल जाते हैं कि हमारे तो एक एमएलए पर भी छापा मारा गया जो बेचारे कैंसर से जूझ रहे थे। मायावती जी ही पहली नेता थी देश की जिन्होंने ईवीएम के खिलाफ आवाज उठाई। तब तो आप लोगों ने उनके उनका साथ नहीं दिया। आप लोग इस बात का विरोध नहीं करते कि क्यों कॉरपोरेट फंडिंग सरकार बंद नहीं करती जिससे हजारों करोड़ रूपया कांग्रेस, बीजेपी आदि पार्टियों को जाता है जिससे चुनानों को आसानी से प्रभावित किया जाता है । आप वे लोग हो तो जाकर राम मंदिर की लाइन में लग जाते हो लेकिन इस बात पर सवाल नहीं उठाते कि धर्म के नाम पर वोट क्यों मांगा जाता है, जबकि संविधान इसकी इजाजत नहीं देता। गुमराह होकर, धनबल और धन के द्वारा मीडिया के बल से प्रभावित होकर आप वोट देने जाते हो, तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप जिन लोगों को चुन रहे हो वह आप अपनी मर्जी से चुन रहे हो या वह सही है।
5. यह कहना कि हमें कोई विरोधी नहीं मिल रहा और हम चंद्रशेखर या उसकी पार्टी को विरोधी मानते हैं पूरी तरह से गलत है। हमारे तो विरोधी चारों तरफ है, पर हमारा यह भी कर्तव्य है कि हम लोगों को सही रास्ता दिखाएं ताकि आगे लोग गुमराह ना हो सके। और वैसे भी हमारा बहुजन समाज बेशक शक्तिशाली है लेकिन एक सीधा समाज है जिसे विरोधी बेवकूफ बनाते हैं और उसके भोलेपन का फायदा उठाते हैं। पर हम अब आगे से ऐसा नहीं होने देंगे। आप भूल गए कि डॉक्टर अंबेडकर जी के समय भी भतेरे नेता कांग्रेस ने खड़े किए थे और फिर उससे हुआ क्या? हुआ यह कि बाबासाहेब जी की पार्टी चुनाव हारी और दूसरी पार्टियों द्वारा खड़े किए गए हमारे समाज के नेता जीतते चले गए, लेकिन इसका दूरगामी परिणाम यह हुआ कि हमारे अधिकार जो बाबा साहेब जी की पार्टी के आने से मिलते हैं वह निरंतर जाने लगे और हमारी स्थिति नई आर्थिक व्यवस्था में और कमजोर होती चली गई। आप लोग इतिहास जानते नहीं है और भविष्य करना चाहते हैं। लेकिन हमें इतिहास भी पता है और हम जानते हैं कि आगे भविष्य में क्या करना है।
6. जो लोग मायावती जी के लिए अपशब्द या बदतमीजी भरी बातें लिखते हैं उन्हें अपनी जबान को लगाम देकर कुछ लिखना चाहिए। अगर वे बाबा साहेब जी के अनुयाई होते तो थोड़ी तमीज होती। लेकिन ऐसे लोग न तो आज तक बाबा साहब जी को समझ पाए और ना कांशीराम जी और बहुजन समाज पार्टी के मिशन को। इनकी बदतमीजियों की वजह से भी पार्टी का नुकसान होता है और अब इन्हें लगता है कि ये दूसरी पार्टी उठा लोगे। लेकिन इन्हें यह नहीं लगता कि यह खुद मौका पुरसत हैं और डरपोक हैं, कि यह जिनकि पक्ष लेते हैं और बीएसपी को गिराते हैं, आज ऐसी बदतमीजी उस पार्टी से कर रहे हो जिस पार्टी ने तब संघर्ष किया जब तुम्हारे बाप दादा अपमानित जीवन जी रहे थे। शर्म आनी चाहिए ऐसे लोगों को। ऐसे लोगों की मां बहने जिस समय अपनी गृहस्थियां सजा रही थी और अपने बच्चे पाल रही थी, उस समय मायावती जी समाज के बच्चों के लिए संघर्ष कर रही। और आज उनके पोते-पोती के उम्र के बच्चे उन पर अभद्र बातें लिखते हैं तो उनको शर्म आनी चाहिए कि ऐसी बातें सिर्फ उनके लिए नहीं लिख रहे, बल्कि अपने परिवार के संस्कार प्रदर्शित कर रहे हैं और अपने मां-बाप और दादा दादी के लिए ही लिख रहे हैं। इन लोगों के पास कोई राजनीतिक समझ नहीं है इसलिए यह राजनीतिक डिबेट ना करके केवल आरोप लगाते हैं और अभद्र भाषा का प्रयोग करते हैं। यह वह किसी आए हुए लोग हैं जो संघर्ष नहीं कर सकते पर उनको बैठा बिताया हुआ चाहिए। और यह वह लोग है जो विपक्ष के आगे लड़ नहीं सकते क्योंकि यह असल में उस गुलाम की तरह है जो आपस में लड़ते हैं लेकिन अपने मालिक से बगावत करने का दम नहीं होता।
7. आकाश आनंद या पार्टी के किसी नेता को पार्टी आगे पीछे करे यह पार्टी का अंदरूनी मामला है। जैसे किसी खेल का एक कोच निर्धारित करता है कि कौनसा खिलाड़ी कब सही है। बीएसपी नीतियों में विश्वास रखती है, नेताओं के दिखावे में नहीं ।
अंततः लोगों को यह समझना चाहिए कि बहुजन समाज पार्टी से जुड़िए और देखिए कि पार्टी कितना संघर्ष करती है। पर मीडिया पूंजीपतियों की कठपुतली है इसलिए उन्हीं की खबरें आप देखते हैं जिनको पूंजीपतियों की पार्टी से मोटा धन आता है। टीवी या मोबाइल स्क्रीन पर चंद्र दृश्य देखकर उत्तेजित होने से तो बदलाव नहीं होगा बल्कि आप भी किसी की कठपुतली बन रहे हो। बदलाव के लिए विशाल कार्य करना पड़ता है और अथक संघर्ष करना पड़ता है। तो वह काम करिए ना कि सिर्फ स्क्रीन का ऑडियंस बनिए। – निखिल सबलानिया Nikhil Sablania
निखिल सबलानिया
डॉ. भीमराव आंबेडकर जी की लिखित, उनके जीवन और कार्यों पर 110 पुस्तकों का सैट ₹ 22000. ऑर्डर लिंक से करें या फोन करें