चमारों! अपनी बहन जी का साथ मत छोड़ना – निखिल सबलानिया

चमारों! अपनी बहन जी का साथ मत छोड़ना – निखिल सबलानिया

Mayawati Behan jiआज जो बात मैं लिखने जा रहा हूं, यह बात आपको दिमाग से समझनी है। यदि आपने मेरी बात समझ ली तो आपको देश की राजनीति और हिंदू धर्म में अपना स्थान समझ आ जाऐगा। और ये बात सिर्फ चमारों पर ही लागू नहीं है, बल्कि सभी दलित, शूद्रों, आदिवासियों, वैश्य, क्षत्रियों और ब्राह्मणों पर भी लागू होती है।

मनुस्मृति सभी वर्णो की स्त्री को ब्राह्मण वर्ण के लिए उपलब्ध कराती है। ब्राह्मण स्त्री को छोड़ कर, सभी को किसी वस्तु की तरह समाज के विभाजन और वर्गीकरण का उपकरण बनाती है। पर ये कब हुआ? क्या ये सिर्फ धर्म का विषय है? नहीं? ये विजेता द्वारा पराजित पक्ष की स्त्रियों के सामूहिक बलात्कार का विषय है।

मौर्य साम्राज्य को धोखे से हटा कर ब्राह्मण साम्राज्य ने अपनी जड़ें जमा लीं। पर उनका उद्देश्य केवल शासन चलाना नहीं था। वे बौद्ध काल, और उससे भी पहले से अपना एक वर्ग और उसके लिए विशेष अधिकारों के लिए मोर्चाबंदी कर रहे थे। सत्ता पाते ही उन्होंने अपनी योजनाओं पर काम करना शुरू किया। बेशक, सत्ता में वे थे, पर उन्हें सिर्फ सत्ता से ही मतलब नहीं था। वे सत्ता का मस्तिष्क बनना चाहते थे। यानी कि, हमेशा के लिए विधान निर्माता। इसके लिए वे अपने सत्ताधारियों को कुछ सहुलियतें दे सकते थे। पर आदमी की असली ताकत, उसकी असली सत्ता, उसकी औरत, या उसके वर्ग की औरत होती है। युद्ध में विजयी पक्ष पराजित पुरूषों के पुरुषत्व का दमन करने के लिए उनकी स्त्रियों का समूहिक बलात्कार करता है। पर हर समय ऐसा नहीं किया जा सकता। इसलिए, उन्होंने अपने हर विधान में, अन्य वर्गों से ताकत खींचने, और उन्हें अपने से नीचा दिखाने के लिए, ऐसे प्रतिबंध लगाएं, कि ब्राह्मण स्त्री पर किसी अन्य वर्ण का हक नहीं है, पर हर वर्ण की स्त्री पर ब्राह्मण हक जमा सकता है। अपनी इस नीति को उन्होंने केवल एक ग्रंथ तक ही सीमित नहीं रखा। बल्कि, सजगता से, वे एक-के-बाद-एक ग्रंथ लिखते गए। उन्होंने अपनी हर दंड संहिता में ब्राह्मण को छूट दी और क्रमिक ढाँचे में, न केवल एक वर्ग को दूसरे के ऊपर बैठा दिया, बल्कि, ऊपर बैठे वर्ग की स्त्री पर से नीचे के वर्ग के पुरूषों का अधिकार खत्म करके, अन्य वर्गों को एक-दूसरे का शत्रु भी बना दिया। यही कारण है कि भारत में जातियाँ तो हैं हीं, पर साथ ही वे अंतर्जातीय विवाह नहीं करते। पर ब्राह्मण यहीं तक नहीं रूके। उन्होंने अपने विधानों को धर्म और ईश्वर के आदेश से जोड़ कर, अपनी योजना को अपरिवर्तनीय और चिरकालिक बना दिया। सत्ता पर कायम रहने का इससे बढ़िया और क्या उपाय है, कि एक वर्ग बाकी सभी वर्गों की स्त्रियों पर हक रख सकता है, जैसे युद्ध में विजेता पराजितों की स्त्रियों का बलात्कार करके उसके पुरुषत्व का दमन करे, और बाकी सभी, उसे छोड़ कर, आपस में स्त्रियों के लिए लड़ने लगें।

पर, सबसे बुरा हाल शूद्र और उसकी औरत, उसकी इज्जत का हुआ। शूद्र की औरत त्रैवर्णों (ब्राह्मण, क्षत्रिय और वैश्य) के लिए, लूट का हिस्सा बन गई। जहां शूद्र से सारी मेहनत और उसकी पूंजी लूट ली जाती, वहीं उसकी औरत को भूखे भेड़ियों की तरह देखा जाने लगा। आदमी की इज्जत, उसकी ताकत होती है, और उसकी ताकत उसे मनोबल देती है। पर यदि इज्जत ही खत्म कर दो तो मनोबल तो अपने-आप ही टूट जाता है। और मनोबल से टूटा आदमी पुरुषत्व खो देता है। और पुरुषत्व ही वह तत्व है जो कुदरत से मिला है। पुरुषत्व ही वह तत्व है जो उसका कुदरती अस्तित्व है। पुरुषत्व ही उसे मादा पर नियंत्रण दिलाता है। पुरुषत्व ही उसे परिवार का पालक बनाता है। पुरुषत्व ही उसे मानसिक नियंत्रण देता जिससे वह अपने शत्रु पर विजय पाता है। पुरुषत्व ही उसे सही या गलत में भेद बताता है। पर औरत के छिनते ही उसका पुरुषत्व छिन्न-भिन्न हो जाता है। पुरुषत्व के खत्म होने पर पुरूष न केवल अपनी औरत से नियंत्रण खो देता है, बल्कि वह अपनी औरत को ही परोसने लगता है, और उसकी स्थिती इतनी दयनीय हो जाती है, कि उसके लिए उसकी औरत खुद तक को गिरवी रख देती है। महाभारत का केंद्रबिंदु पाण्डवों मे खोया यही ‘पुरुषत्व’ है। द्रौपदी को हारते ही पाण्डव अपना पुरुषत्व खो देते हैं। और तब अर्जुन इसलिए युद्ध से पीछे नहीं हटता, क्योंकि उसे रक्त संबंधियों को मारा नहीं जा रहा था। बल्कि, इसलिए, कि उसने अपना पुरुषत्व खो दिया था। इसलिए महाभारत की कथा में वनवास में अर्जुन नारी के भेष में भी रहता दिखाया गया है। महाभारत के लेखक ने यह सिद्ध करने के लिए कि अर्जुन का पुरुषत्व समाप्त हो गया, ऐसा उसे दिखाया। और फिर वही अर्जुन शस्त्र उठाने से कतराने लगता है। कृष्ण उसके पुरुषत्व को जगाने के लिए ही अपना संदेश देते हैं। रामायण में राम और लक्ष्मण के अकेले होने पर भी सेना बनाकर रावण को परास्त करना, पुरुषत्व के केंद्रबिंदु को उजागर करता है। बुद्ध का गृहत्याग उनके पुरुषत्व की कमी या केवल जीवन से हट कर निर्वाण प्राप्त करने के लिए नहीं था। उनके धार्मिक देसना ने ब्राह्मणवाद को ललकारा था और जीवन भर वे ब्राह्मणों से अपने ज्ञान से लोहा लेते रहे। यह उनका प्रबल पुरुषत्व ही था। अन्यथा निर्वाण का मार्ग तो उन्होंने छत्तीस की उम्र में प्राप्त कर लिया था। पर अस्सी की उम्र तक वे क्यों ब्राह्मणवाद से लड़ते रहे, यदि निर्वाण प्राप्ति ही उनका उद्देश्य था। वे सबका पुरुषत्व जगा रहे थे। और इसी का परिणाम हुआ कि शूद्रों का मौर्य साम्राज्य अस्तित्व में आया।

पर क्या पुरुषत्व केवल शूद्रों का ही गया? क्या क्षत्रिय और वैश्य इसलिए बच गए थे? क्योंकि उनकी स्त्रियों पर शूद्र हक नहीं जमा सकते थे? क्या एक आदमी इसलिए खुद को अपमानित महसूस नहीं करता कि उसकी औरत पर एक वर्ग हक नहीं जमा सकता पर बाकी एक, या बाकी दो वर्ग जमा सकते हैं? क्षत्रिय के पुरुषत्व को इसलिए सीमित नियंत्रित करना, ब्राह्मणों ने जरुरी समझा, कि एक तो वे खुद उन पर नियंत्रण रख सके, दूसरे, उनके जरिए बाकियों पर नियंत्रण रख सके। इसलिए अपनी (ब्राह्मणों की) स्त्रियों को छोड़ कर अन्य वर्णों, वैश्य और शूद्र की स्त्रियों पर उनका हक वैधानिक कर दिया। वैश्य पर क्षत्रिय से अधिक नियंत्रण जरुरी था। क्योंकि वैश्य अपने कार्यों के लिए शूद्रों पर निर्भर थे। इससे वैश्यों के शूद्रों से मिलकर सत्ता को चुनौती मिल सकती थी। इसलिए वैश्य के पुरुषत्व को कमजोर करने के लिए उससे ब्राह्मण और क्षत्रिय स्त्रियों का हक छीन लिया गया। पर ऐसे में तो वैश्य सीधा शूद्र से मिल जाता और पूरी ब्राह्मणवादी व्यवस्था चौपट हो जाती। इसलिए शूद्रों को ब्राह्मण और क्षत्रिय स्त्रियों के साथ ही वैश्य की स्त्रियों से भी वंचित कर दिया गया। और इसके कई प्रमुख ऐतिहासिक तथ्य भी हैं। एक तो यह कि ब्राह्मणों को चुनौती देने वाले बुद्ध को वैश्यों का सर्थन मिला। जबकि बुद्ध क्षत्रिय थे। एक क्षत्रिय द्वारा ब्राह्मणों को चुनौती देने का प्रसंग केवल बुद्ध का नहीं है। क्षत्रिय विश्वामित्र और ब्राह्मण वशिष्ठ के बीच की प्रतिस्पर्धा का प्रसंग तो इतना गहरा ब्राह्मणों के स्मृति पटल पर इंकित है, कि विश्वामित्र तो उनकी सर्वोच्चता को कायम रखने के लिए एक खतरे का संदेश है। साथ ही विश्वामित्र, यानी कि एक उठते हुए क्षत्रिय को कैसे रोका जाए, यह ब्राह्मणों की राजनीति की सबसे महत्वपूर्ण पुस्तक है। तो बुद्ध, एक क्षत्रिय का वैश्यों द्वारा समर्थन, ब्राह्मणों के आगे कितना घातक राजनैतिक प्रयोग था, जिसने न केवल शूद्रों के मौर्य साम्राज्य की स्थापना ही नहीं की, बल्कि अशोक जैसा सम्राट दिया जिसने जमबूद्विप (भारत का प्राचीन नाम) में न केवल बुद्ध के संदेशों को जगह-जगह पहुंचाया, बुद्ध की भाषा, पालि, को राजभाषा बनाया, और तो और, उसने बुद्ध के संदेशों को दुनियाभर में भी पहुंचाया। ब्राह्मणों की सर्वोच्चता और सत्ता के लिए इससे बुरा आघात और क्या हो सकता था? और समय आने पर उन्होंने मौर्य साम्राज्य में ही घुस कर उसकी पीठ में छुरा घोंपा, सत्ता में आकर मनुस्मृति जैसे नए ग्रंथों की रचना की और यदा-कदा, बाहरी लोगों के शासन पर भी अपनी सर्वोच्चता कायम रखी, जब तक कि मैकाॅले ने भारतीय दंड संहिता (इंडियन पीनल कोड) को लागू करके, ब्राह्मणों की हिंदुओं में सर्वोच्चता खत्म नहीं कर दी और उन्हें भी समान अपराधों के लिए समान दंड का अपराधी नहीं बना दिया। मैकाॅले की भारतीय दंड संहिता में, पहली बार ब्राह्मण को भी मृत्यु दंड देने का प्रावधान बनाया गया, जो मनुस्मृति और बाद के ब्राह्मणों द्वारा बनाए ग्रंथों में नहीं थे। ब्राह्मणों की यही खीज थी, जिसे उन्होंने स्वतंत्रता संग्राम का रूप दिया और कांग्रेस पार्टी बनाई। अन्यथा क्षत्रिय और मुगल शासकों ने अंग्रेजों से तालमेल बैठा लिया था, वैश्य अंग्रेजों के फाइनेंसर और उनके उद्योगों में भागी बन गए थे, और शूद्रों को सेना, शिक्षा और सरकारी नौकरियां तो मिल ही रही थी, और उनके व्यापार भी आगे बढ़ रहे थे।

पर एक चीज जो हिंदू समाज की झुकी हुई रीढ़ की हड्डी बन गई थी और जो हिंदू समाज का कूबढ़ बन गया था, वह थी वर्ण व्यवस्था। दो हजार सालों तक लागू होने और उसे ईश्वरीय आदेश बताने के कारण, विवेकानंद (शूद्र) और गांधी (वैश्य) भी इसके प्रमोटर (बढ़ाने वाले) बन गए थे। पर ज्योतिबा फुले (शूद्र), पेरियार (शूद्र) और डाॅ. भीमराव आंबेडकर जी (अंत्यज – वर्ण व्यवस्था से बाहर) ने वर्ण व्यवस्था पर पुनर्विचार करके इसकी कमियों और खतरों को उजागर किया। पर ये समस्या आजतक बनी हुई है और भारतीय राजनीति में और गहराई से समाती जा रही है। पर, हम इसका एक प्रमुख तत्व आजतक समझ नहीं पाए। और वह है ‘पुरुषत्व’ (मर्दानगी) पर प्रहार। पर क्या इस राजनीति के जनक, यानी कि ब्राह्मणों के बुद्धिजीवी, यह सब नहीं समझते, जबकि इसके केंद्रबिंदु में वही हैं, उन्होंने ही पुरुषत्व पर आघात की राजनीति की रचना की है, उन्हें ही इसका सबसे ज्यादा फायदा हुआ है, और वे ही अंग्रेजों के समय से अपनी सर्वोच्चता के लिए संघर्ष कर रहे हैं। पर उन्होंने यह सब जानते हुए भी आपसे छुपाया है और इस पर वह प्रहार नहीं किया, जिससे कि यह समस्या हमेशा के लिए खत्म हो जाती। बल्कि, उन्होंने, इस मूल समस्या को जिंदा रखने के लिए, इसकी (पुरुषत्व पर आघात) की दिशा बदल दी। उन्होंने इसे मुसलमानों की तरफ मोड़ दिया है और इस योजना को ‘हिंदू बनाम मुसलमान’ बना दिया है। इस से वे एक शातिर की तरह वर्ण व्यवस्था को कायम रखने में सफल हुए हैं। पर, चूंकि हिंदू भीतर से, एक दूसरे के पुरुषत्व को दबाते हैं, इसलिए उनमें एक ऐसा ताकतवर पुरुषत्व तबतक पैदा नहीं होगा जबतक कि वे अपने धार्मिक ग्रंथों की वर्ण व्यवस्था को त्याग न दें। पर क्या कोई उन्हें इसके लिए तैयार कर रहा है? उल्टा, उनके कमजोर पुरुषत्व को मुसलमानों के एक मजबूत पुरुषत्व से लड़वाया जा रहा है। क्या भारत में यदि एक भी मुसलमान नहीं रहा, तो क्या हिंदू एक होंगे? उत्तर, इतिहास में है। नहीं। वर्ण व्यवस्था उन्हें कभी एक नहीं होने देगी।

मुसलमानों के पुरुषत्व से टकराव की चपेट में लगभग सभी हिंदू आ चुके हैं। पुरुषत्व पर आघात करने का सिद्धांत कहता है कि जो मुसलमानों के विरोध करने वाली टोली का हिस्सा नहीं बनते, उनका पुरुषत्व कमजोर है। और एक मजबूत पुरुषत्व की जरूरत शूद्रों और अति शूद्रों से ज्यादा और किसमें होगी, जिनके पुरुषत्व को हजारों वर्षों से दबा कर रखा गया है। पर क्या वह मुसलमान ने दबाया है, जो सभी हिंदुओं को एक नजर से देखता है, यानी कि समान पुरुषत्व के भाव से? या उन ब्राह्मण ग्रंथों ने दबाया है जिन्होंने वर्ण व्यवस्था में औरतों को उपकरण बना कर यह व्यवस्था चिरस्थाई बना दी? निश्चित ही, शूद्रों का पुरुषत्व, उन्हीं पर लागू किए ग्रंथों ने खत्म किया है। पर जब-जब रविदास, कबीर, ज्योतिबा फुले, डॉ. आंबेडकर जी और कांशी राम जी जैसे मजबूत पुरूषों ने शूद्रों में पुरुषत्व जगाया है, तो हिंदू समाज में भी एक क्रांति आई है और शूद्रों के लिए तो यह जीवन बूटी के समान है, क्योंकि उनका पुरुषत्व हजारों सालों से किसी ज्वालामुखी के लावे की तरह दहक रहा है। मुसलमानों के विरुद्ध इस दहकते ज्वालामुखी को ही उजागर करने का प्रयास किया जा रहा है। पर जैसे स्वतंत्रता आंदोलन असल में ब्राह्मणों सी सत्ता के लिए रास्ते खोलने का एक छदम रूप था, वैसे ही हिंदू बनाम मुसलमान केवल ब्राह्मणों की सत्ता प्राप्ति के लिए एक छदम रूप से निर्णायक आंदोलन है, और जैसे पाकिस्तान बना, वैसे देश के और टुकड़े होने पर भी, उनको उतना बड़ा हिस्सा मिल जाएगा, जो एक ऐसे धर्म से संचालित होगा, जिसका नियंत्रण उनके हाथ में होगा। यह हिंदू बनाम मुसलमान ब्राह्मणों की वैसी ही क्रांति है जो मौर्य साम्राज्य के खिलाफ खड़ी हुई थी।

हम इस बात पर तो ध्यान देते हैं, कि कांशीराम जी ने मायावती जी को मुख्यमंत्री बनाया, पर क्यों बनाया, इसके पीछे का मनोविज्ञान क्या था। कांशीराम जी ने, जहां नब्बे के दशक में एक अति शूद्र महिला को आगे किया; पर पचास के दशक में डाॅ. आंबेडकर जी ने एक ब्राह्मण महिला को आगे किया (उनकी दूसरी धर्मपत्नी आदरणीय सविता आंबेडकर जी)। डाॅ. आंबेडकर जी ने ऐसा करके न केवल वर्ण व्यवस्था पर हमला किया, बल्कि उन सभी वर्णों के हिंदुओं का पुरुषत्व जगाया जिनके लिए ब्राह्मण स्त्री अधिकार क्षेत्र से परे थी, यानी कि क्षत्रिय और वैश्य का भी पुरुषत्व बढ़ाया। क्योंकि डाॅ. आंबेडकर जी हिंदुओं में पुरुषत्व की कमी की समस्या को जानते थे। उनकी लेखनी में, वे कई बार लिखते हैं, कि वर्ण व्यवस्था द्वारा हिंदुओं में अधिकांश लोगों को हथियार रखने से वंचित करने पर उनका पुरुषत्व कमजोर हुआ। पर नब्बे के दशक तक वर्ण व्यवस्था द्वारा पुरुषत्व पर आघात करने का क्रम पुरजोर तरीके से चालू था। पर इस पर एक जोरदार चोट की एक शूद्र महिला ने। आदरणीय फूलन देवी जी ने। पर उन्हें तो सिर्फ डाकू और एक समस्या बता कर एक तरफ कर दिया गया। पर प्रश्न यह है कि जब फूलन देवी जी की अस्मिता पर प्रहार हो रहा था तो शूद्र पूरूषों का पुरुषत्व कहां सोया हुआ था? तब तक सोए हुए पुरुषत्व वाले वर्गों की महिलाएं किस हाल में थी?

उत्तर प्रदेश का अति शूद्र वर्ग चमार। हजारों सालों से वर्ण व्यवस्था के नीचे दबा एक ऐसा वर्ग जो हर प्रकार से तोड़ दिया गया था। सबसे बुरा हाल था महिलाओं का। चमार महिलाओं के बारे में अभद्र बातें लोकोक्तियां बन गई थीं। बहुत सी युवतियां अपने परिवार के पोषण के लिए किसी अमीर उच्च वर्ण वाले पुरूष के किसी दूसरे घर में दूसरी पत्नि बन कर रह रही थीं। बेशक, इस वर्ग की जनसंख्या बहुत थी और बहुत लोग धनवान भी थे, पर अधिकांशतर गरीब। पर यहाँ मुद्दा अमीरी – गरीबी का नहीं है। मुद्दा यह है, कि इतनी विशाल आबादी और अच्छे जिस्म के ही ने के बाद भी, क्यों उनकी महिलाओं की ऐसी स्थिति बनीं? उत्तर है, ब्राह्मणों द्वारा बनाई गई वर्ण व्यवस्था, जिसने उन्हे हर तरीके से तो दबाकर रखा ही, पर साथ ही उनका पुरुषत्व खत्म कर दिया। यह कोई दो हजार वर्षो के दमन का परिणाम था, जो धार्मिक आदेशों के कारण था। पर कांशीराम जी, चमारों में, इस पुरुषत्व के दबे हुए होने की व्यथा समझ गए थे। इसलिए ही उन्होंने मंच से कहा था कि, ‘हमने एक चमारन को मुख्यमंत्री बनाया।” कांशीराम जी गूढ़ समझ वाले राजनीतिज्ञ थे। उनके वे शब्द सहसा नहीं थे। उन्होंने खास चुनकर ये शब्द कहे थे। आदरणीय मायावती जी को ‘चमारन’ शब्द से संबोधित करके उन्होंने यह उद्घोषणा कर दी थी, कि जिस शब्द को हजारों सालों के दमन के बाद अपमान सूचक बनाया, वह अब से आदर और सम्मान सूचक बन गया है। उनके वक्तव्य का दूसरा और प्रमुख कारण था कि न केवल चमारों में, बल्कि सभी शूद्रों में पुरुषत्व को जगाना। यदि यहां पुरूष होता तो मूवमेंट आगे नहीं बढ़ती। क्योंकि घटे हुए पुरुषत्व वाले पुरूष महिलाओं को आगे करते हैं, और ऐसे पुरुषों में आगे आने का साहस नहीं होता। पुरुषत्व खत्म कर दिए गए वर्ग के पुरुष की एक समस्या यह भी होती है कि उसे अपने वर्ग के दूसरे पुरुष पर विश्वास नहीं आता, क्योंकि वह दूसरे को भी अपने घटे हुए पुरुषत्व के माप से देखता है। सो उसका कमजोर मनोबल सामने वाले को भी कमजोर रखना चाहता है, ताकि वह समानता का ऐहसास कर सके। कांशीराम जी यह जानते थे। और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है, कि अपने नारीत्व का बलिदान करके आदरणीय मायावती जी ने, पुरूषों में सोए हुए पुरुषत्व को जगाने के लिए, अपने वैवाहिक जीवन की खुशियों का बलिदान दिया। शायद वे फूलन देवी जी से भी प्रेरित थीं, जो उनके समकालीन थीं। लोगों ने उन्हें अपनी शेर ‘बहिन जी’ कहा। यानी कि, जिस वर्ग की महिलाओं को केवल गलत नज़र से ही देखा जाता था, उसी वर्ण की महिला को आदर से सबकी बहन की दृष्टि से देखा जाने लगा। क्या वर्ण व्यवस्था पर इससे बड़ा प्रहार हो सकता था? जो वर्ण व्यवस्था एक वर्ग को सभी वर्गों की महिलाओं पर नाजायज दृष्टि रखने का अधिकार देती थी, और शूद्रों की महिलाओं को किसी मछुआरे के सामने मछलियों के तालाब की तरह हज़ारों वर्षों से पेश कर रही थी, ऐसी व्यवस्था को कांशीराम जी की समझ और मायावती जी के बलिदान ने बदल दिया। और दो शब्दों ने भारतीय नारी को वर्ण व्यवस्था में उपकरण के रूप में प्रयोग करने के चंगुल से निकाल दिया। यह शब्द हैं – बहन जी।

तो मैं पूछना चाहता हूं कि जिस बहन ने इतना किया है, उस बहन का साथ दोगे या नहीं? जिनको लगता है कि बहन जी ने अपना घर भरा है, तो वो ये बताओ कि बहन ने जो इतना बलिदान दिया तो राखी में क्या इतना भी नहीं दे सकते? और बहन जी कोई अपने साथ तो ले नहीं जाएंगी, उल्टा उनका बलिदान आपकी पीढ़ियों को ही नई जिंदगी देगा।

कुछ लोगों ये न समझें कि यह आलेख किसी वर्ण या ब्राह्मणों के विरोध में है। मुझे पूरा विश्वास है कि हर ब्राह्मण हिंदुओं और अपने देश को मजबूत बनाने के लिए इस विषय को गम्भीरता से लेगा। जरुरी नहीं कि बिचारे ब्राह्मण इतनी गहराई से बातों को समझें। उन्होंने भी धार्मिक आदेशों को ईश्वरीय वैसे ही मान लिया हे जैसे सभी ने माना है। इसलिए, इस आलेख को पढ़ने वाले सभी पाठकों से मेरा अनुरोध है कि मौजूद ब्राह्मणों को दोषी की दृष्टि से न देखें, बल्कि उन्हें और प्यार दें, क्योंकि सबसे अलग थलग वे बिचारे ही हैं, न कि वर्ण आधारित आदर दें।

आपका

निखिल सबलानिया

Nikhil Sablania

22 फरवरी 2026

निखिल सबलानिया जी द्वारा लिखित, अनुवादित और प्रकाशित पुस्तकों के लिए संपर्क करें – राजीव 8527338138.

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